साहस जुटाएँ संकल्प जगाएँ
परमवन्दनीया माताजी के व्याख्यान गायत्री परिजनों के लिए एक अमूल्य धरोहर हैं। उनके वक्तव्यों में माँ की ममता भी है एवं गायत्री परिवार की संस्थापिका के नेतृत्व के स्वर भी उनमें सुनने को मिलते हैं। अपने एक ऐसे ही प्रस्तुत उद्बोधन में वन्दनीया माताजी प्रत्येक गायत्री परिजन को ललकारते हुए कहती हैं कि उन्हें हिम्मत न हारकर अपने साहस को जुटाते हुए युगधर्म का निर्वहन करने के लिए आगे आने की आवश्यकता है।
वे याद दिलाती हैं कि परमपूज्य गुरुदेव ने गायत्री शक्तिपीठों को किस उद्देश्य से बनाया था। उनका उद्देश्य जनमानस को झकझोरना और सद्विचारों को प्रसारित करना था। उन उद्देश्यों से विपरीत जाने पर सभी अपने गुरु को दिए गए वचन के प्रति विश्वासघाती बनेंगे। परमवन्दनीया माताजी पूज्य गुरुदेव का उदाहरण देती हैं कि कितने त्याग से उन्होंने गायत्री परिवार को स्थापित किया। आइए हृदयगम करते हैं उनकी अमृतवाणी को ........... ।
हिम्मत न हार, युद्ध कर
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ—
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।
बेटियों और हमारे प्रज्ञापुत्रो! अर्जुन को जब भगवान श्रीकृष्ण ने ललकारा और उन्होंने एक ऐसा बड़ा शब्द कह दिया कि अरे जनखा! तुझे जनानियों के तरीके से मेरे सामने गिड़गिड़ाते-मिनमिनाते हुए शरम नहीं आती है? तुझे धनुष लेकर के और बाण लेकर के खड़ा हो जाना चाहिए। जब कि मैं तेरे साथ हूँ, मैं तेरा सारथी बनने के लिए तैयार हूँ और तू यह कह रहा है, हिम्मत हार रहा है। इसमें हिम्मत हारने की क्या बात है? खड़ा हो जा देखा जाएगा, जब लड़ाई में कूद पड़े हैं तो मरेंगे या मारेंगे, दो काम करेंगे। डरता क्यों है? जान से डर रहा है, हिम्मत हार रहा है, परिवारवालों की याद आ रही है? नहीं साहब! परिवारवालों की तो याद नहीं आ रही है। तो किसकी आ रही है? किसी की नहीं आ रही है, तो फिर तू एक काम कर, युद्ध लड़।
भीम को उसकी माँ ने बलिदान होने के लिए भेज दिया। एक गाँव था जहाँ एक राक्षस रहता था और वहाँ रोज बलि चढ़ती थी। क्या बलि चढ़ती थी? वह रोज एक इनसान को खाता था। एक दिन एक ब्राह्मण परिवार की बारी आई, उसमें एक बच्चा था। बच्चा एक नौजवान लड़का था, उसकी बारी आई तो भीम तिलमिला उठे।
भीम ने कहा कि यह ब्राह्मण बालक यदि इसके पेट में चला जाएगा तो इसकी माँ का तो कोई नहीं है। यह तो अपनी माँ का अकेला है, हम तो पाँच भाई हैं। अगर पाँच में से एक घट जाएगा तो चार रह जाएँगे। चार तो हमारी माँ के लिए हैं ही और वह कुन्ती के पास गए। कुन्ती के पास जब गए तो उन्होंने उनसे एक बात कही कि माँ आज राक्षस एक बलिदान चाहता है और वह एक को खाएगा। उसकी बारी आ गई है क्या तुम स्वेच्छा से कह सकती हो कि बेटा! मैं आज तुझे बलिदान होने के लिए देती हूँ।
उसने कहा कि बेटा! मैं सपूतों की माँ हूँ, कपूतों की नहीं, मैं तुझे आज्ञा देती हूँ कि तू जा और उस राक्षस का मुकाबला कर, यदि हारता है तो तुझे वह राक्षस खा जाएगा और जीतता है तो तू विजेता है ही। क्योंकि उसके अन्दर बल था, उसके अन्दर साहस था, फिर उसे कौन राक्षस खा सकता है? कोई राक्षस नहीं खा सकता है। भीम उस राक्षस को मारकर घर आ गए और विजेता हो गए।
साहस और हिम्मत जुटाएँ
यह कथानक किसके ऊपर लागू हुआ? यह तो आप महाभारत की बात कह रही हैं, आप तो यह बताइए कि वर्तमान में हमें क्या करना चाहिए और हमको भीम कैसे बनना चाहिए? हमको किस तरीके से आगे आना चाहिए और किस तरीके से अर्जुन के तरीके से हम धनुष और बाण लेकर के आगे चलें, यह बात बताइए।
मैं वही बात आपसे निवेदन कर रही हूँ कि आप अपने अन्दर हिम्मत और साहस जुटा लें। हिम्मत और साहस की कमी है और मुझे आपके अन्दर कोई कमी नहीं दिखाई पड़ती। भावनाओं की कमी? नहीं भावनाओं की कमी नहीं है, यदि भावनाओं की कमी होती तो आप इतनी दूर से पैसा खर्च करके क्यों आए होते?
भावनाओं की कमी नहीं है, श्रद्धा की भी कमी नहीं है। कमी है तो आपके आलस्य और प्रमाद की कमी है, इसकी वजह से आप आगे नहीं बढ़ पाते हैं , आगे की पंक्ति में नहीं आ पाते हैं। नेताओं से तो हमें नफरत है कि जो नेता बनते हैं और नेतागीरी के सामने और कोई उनको दिखाई नहीं पड़ता। उससे अन्धे हो जाते हैं तो हमें नागवार गुजरता है, लेकिन जो हिम्मतवाले लड़के हैं उनको छाती से लगाने का हमारा मन होता है कि हम इनको छाती से लगाएँ, कलेजे से लगाएँ, इनके हाथों को चूमें और इनके माथे को चूमें। इनके अन्दर कितना बल है, कितना साहस है।
मठों का संकल्प
शक्तिपीठें कभी बनाई गई थीं, गुरुजी ने आप लोगों को संकल्प दिलवाया था। कल जो छत्तीसगढ़ वाले मेरे पास सब मिल करके आए तो मैं उनसे कह रही थी कि कभी समय था कि जिस तरीके से समर्थ गुरु रामदास ने मठ बनाए थे और मठ बनाने का उनका एक ही उद्देश्य था कि हमारे राष्ट्र के लिए एक कर्णधार पैदा हो। उन्होंने वहाँ सशक्त हनुमान मठ बनाए थे। इसी तरीके से गुरुजी का एक प्लान था और यह था कि हम शक्तिपीठ बनाएँ।
जो बेचारे यहाँ नहीं आ पाते हैं वे वहाँ से प्रेरणा पाएँ, वहाँ संस्कार मनाए जाएँ, संस्कार महोत्सव मनाए जाएँ, बाल संस्कारशाला चलाई जाएँ, लेकिन हो गया वह उलटा। जो बनाया तो बड़ी उम्मीदों से था, लोगों ने पैसा भी बहुत खरच किया। जनता ने बहुत पैसा खर्च किया और उनके मनोबल की भी दाद देनी पड़ेगी, जिन्होंने कि शक्तिपीठ बनाने में संकल्प लिया, लेकिन एक बात कहने में मैं चुप नहीं हूँ कि उन्होंने एक व्यापार का, एक धन्धे का रूप दे दिया। व्यापार नहीं चाहिए, जो चाहिए उसको कैसे आप भूल गए? जो आपके गुरुजी बता करके गए हैं, उसे आप कैसे भूल गए? उससे कैसे भटक गए आप? आपने व्यापारिक केन्द्र कैसे बना लिया उसको? जबकि आपसे तो यह कहा था कि यहाँ से विचार फैलने चाहिए।
शक्तिपीठों का उद्देश्य
यह सब देखकर बेटे, उनको बड़ा दुःख हुआ। उन्होंने अपने मन में पश्चाताप किया कि मैंने एक बहुत बड़ी भूल की। भूल यह की है कि मैंने शक्तिपीठ क्यों बनवाए? मैंने कहा कि क्यों साहब! आपने ही तो तिलक किए और रुपये दिए थे। उन्होंने कहा कि हमने तिलक किया और शक्तिपीठ बनाने के लिए इनको रुपये दिए, लेकिन यह भूल हो गई कि जिस उद्देश्य से हम चाहते थे वह नहीं हुआ। तो क्या किया उन्होंने?
उन्होंने यह किया कि स्वाध्याय मण्डल चालू किए। उन्होंने कहा कि अब हम चलती-फिरती शक्तिपीठ बनाएँगे। यह तो जड़ होते जा रहे हैं, यह तो व्यापारी होते जा रहे हैं, इनका तो दिमाग उसमें चलता हुआ चला जा रहा है। कोई डिग्री कॉलेज खोल रहा है, कोई इण्टर कॉलेज खोल रहा है, कोई हाईस्कूल खोल रहा है, तो कोई कुछ करा रहा है, तो कोई कुछ व्यापारिक केन्द्र चला रहा है। सब उलझते जा रहे हैं।
जबकि उद्देश्य यह था कि जनता का मनोबल ऊँचा उठाएँ और हर बच्चे में संस्कार और प्रेरणा उभरती हुई चली जाएँ, ताकि आने वाली पीढ़ी जो हमारे राष्ट्र की कर्णधार होने वाली है, वह कायर पीढ़ी न कहलाए, बुझदिल पीढ़ी न कहलाए। यह हमारा उद्देश्य था। संस्कार देने का उद्देश्य था कि जो बच्चे माँ-बाप को नमन करना नहीं जानते कि प्रणाम किसे कहते हैं, वह नमन कराने से लेकर के आध्यात्मिक मार्ग पर चलाने तक के लिए शक्तिपीठ बनाए गए थे। उनको बहुत दुःख हुआ और मुझे भी बहुत दुःख हुआ। मुझे अपने मन में यह दुःख हुआ कि यह क्या हुआ?
व्यापार नहीं, विचार फैलाएँ
चलो अब बात पुरानी हो गई सो हो गई। आपने पिछले दिनों बहुत डाँट फटकार खाई है। अब मैं डाँट-फटकार तो नहीं लगाऊँगी, पर बात है तो है। वह तो कहनी ही पड़ेगी। मैंने यह बात आपके कानों में इसलिए डाल दी कि शक्तिपीठें व्यापार का, धन्धे का केन्द्र नहीं हैं। हमारा कोई भी शक्तिपीठ धन्धे के लिए नहीं है। साहित्य हमारे पास है, स्टीकर हमारे पास है, सब कुछ हमारे पास है। और जहाँ के भी शक्तिपीठ को आप देखिए वहाँ व्यापार लगा रखा है। सब जगह व्यापार लगा रखा है।
शक्तिपीठ वालों ने कहा कि हमारे हाथ में यह अच्छा मिशन लग गया, गुरुजी का एक नाम अच्छा हाथ लग गया है कि गुरुजी के नाम पर चाहे जो करो, माँगो, गुरुजी के नाम पर साहित्य, गुरुजी के नाम पर चाहे जो काम करो। एक जगह नहीं मैं हजारों गिना सकती हूँ। यह क्या बात हो गईं? भाई! यह क्या हो गया? चलो उसमें तो गुरुजी का नाम है मान लिया, लेकिन उसमें क्या है जो तुमने धन्धा बना रखा है। धन्धा नहीं बनाना चाहिए एक बात।
दूसरी बात यह कि जो आपको जन-जन तक जाना था, गुरुजी ने यह कहा था कि आप संकल्प ले रहे हैं तो आप जन-जन तक जाना, प्रचार-प्रसार करना, हर घर में जाना, महोत्सव मनाना, आप जन्मदिन मनाना, यज्ञोपवीत संस्कार मनाना, अन्य संस्कारों को आप मनाना और घर-घर आप जाना, उस बात को आप गए भूल। नहीं साहब! अब फिर से पाठ पढ़िए, अब उसको तो भूल जाइए कि पीछे आपने क्या किया था और कैसे चले थे और क्या हुआ था। अब आगे चलिए, अब आगे का मार्ग बताते हैं अपेक्षा इसके कि हम पीछे की नाराजगी आपसे कहते फिरें, जिससे कि आपके मन में भी दुःख हो और हमारे मन में भी दुःख हो, पर चलाने वाले की श्रेष्ठता इसमें है कि वह आगे का मार्ग बतावे।
आगे क्या करना है?
अब आगे के मार्ग की बात आ रही है तो आपको करना क्या चाहिए? आपको यही करना चाहिए, जो मैंने अभी निवेदन किया था कि संस्कारों को पुनर्जीवित कीजिए, संस्कार महोत्सव मनाइए। यहाँ से जो कार्यक्रम आपको दिए जा रहे हैं, अभी तो हमने गिनी-चुनी जगह पर दिया है, लेकिन सन् 2000 तक हम देंगे-ही-देंगे, तुम चाहे जितनी करना-कौन मना करता है। पर सब अभी कर लोगे, यह क्या जरूरी है? जहाँ हमने दिए हैं, उन्हीं को सफल बनाने के लिए आपस में मिल करके, गुथ करके काम कीजिए न।
नहीं साहब! हमारा तो अलग ढपली-अलग राग होगा। हम तो इसके विरोधी, वह इसका विरोधी, सब विरोधी, बहुतों का विरोधी। यह काहे का विरोध है, जरा बताना मुझे। केवल एक है, जिसका नाम है अहंकार। अहंकार जब व्यक्ति को आ जाता है, तो चाहे वह मैनेजिंग ट्रस्टी हो या ट्रस्टी हो, चाहे बिना ट्रस्टी हो, बस उसके ऊपर अहंकार का भूत सवार हो जाता है और दूसरा हो जाता है—नेतागीरी का। नेतागीरी गा-गाकर वह फूलकर लट्टू हो जाता है और जब कहीं कोई माला और पहना दे तो जाने वह कौन बादशाह हो जाता है।
कल मैंने सब लड़कों को हँसा दिया। हमारे यहाँ वृन्दावन में रथ का मेला होता है। पहले कभी मैं एक बार देखने गई तो मैंने क्या देखा कि जो अनपढ़ थे, जो पिछड़े थे जिनको यह ज्ञान नहीं था कि व्यक्तित्व जो बनता है, वह अन्दर से बनता है। व्यक्तित्व न तो पहनावे से बनता है कि बढ़िया चमचमाते हुए, भकभकाते हुए कपड़े पहन रहे हैं। मैला-कुचैला तो नहीं होना चाहिए, पर ऐसे बन ठन कर डोल रहे हैं, जैसे कि दूल्हा ही फिर रहा हो, अभी इसी का विवाह होने वाला है। यह जो शानोशौकत है, यह जो दिखावा है, यह गलत है। इससे व्यक्तित्व नहीं बनता।
वृन्दावन में क्या देखा?
अभी मैंने एक बात कही कि वृन्दावन में मैंने क्या देखा है? एक तो यह कि लोग फूलमाला लटकाए आवें और एक पान खा लें और फिर क्या करें? कभी तो ओंठों को देखें कि अभी वे लाल हुए कि नहीं हुए? हमारी जो यह जीभ है और हमने जो पान खाया है इससे हमारी जीभ लाल हुई कि नहीं हुई। वह निकाल-निकालकर देखें। मुझे बड़ी हँसी आई और मैंने एक नहीं, हजारों की तादाद में देखा। मैंने कहा कि देखो इनको ऐसा मालूम पड़ रहा है कि एक फूलमाला पहन ली और पान खा लिया है तो जाने हम कौन साहबजादे हो गए।
इनमें यह भी अक्ल नहीं है कि कमीज के बटन तो ठीक से लगा लें, वह भी खुले हुए हैं। आस्तीन है सो आस्तीन लटक रही हैं। कुछ ऐसे ही सब तरह के लोग फिर रहे हैं और माला लटकाने का शौक आ गया तब तो मटक-मटककर चल रहे हैं। देखो कैसा भगत आ गया है। ऐसे ही नेताओं की हालत है। नेता में भी बिलकुल यही होता है। आप देखिए जब तक वह गद्दी पर नहीं बैठा है, तब तक तो सर रगड़ने वालों में सम्मिलित रहता है और जहाँ वह बना नेता, फिर देखो वह नेता कैसे अँगूठा दिखाता है।
गुरुदेव की स्वयंसेवक वृत्ति
अध्यात्म पर भी यही बात लागू होती है। अध्यात्म में जो नेता बनेगा, वह जरूर गिरेगा। एक-न-एक दिन निश्चित वह गिरने वाला ही है; क्योंकि उसके अन्दर में नेतागीरी आ गई न। उसके अन्दर में एक स्वयंसेवक की वृत्ति नहीं आई। गुरुजी के अन्दर स्वयंसेवक की वृत्ति थी।
कभी भी उनके अन्दर कोई अहंकार नाम की कोई चीज नहीं थी। बड़े-से-बड़ा व्यक्ति आ जाए और छोटे-से-छोटा आ जाए, उनके लिए सभी समान थे। यह बात अलग है कि किसी को समय ज्यादा दे दिया, जो उनके सिद्धान्तों से मेल खाता था, उसको जरा ज्यादा देर तक बैठा लेते थे और जिससे नहीं मिल पाया, उसे जरा जल्दी विदा कर दिया, पर उनके लिए सभी समान थे; चाहे वह गरीब हो, चाहे अमीर हो। उन्हें कभी गरीब-अमीर से कोई लेना-देना नहीं था, उन्हें तो उनकी कष्ट-कठिनाइयों की लिस्ट से लेना-देना था।
बहुत सारे ऐसे लड़के हैं, जिनके पास पैसा नहीं है, पर वह रात और दिन हमारे इशारे पर चलते हैं तो उनको क्या कहेंगे? उनको छोटा कहेंगे? नहीं, उनको छोटा नहीं कहेंगे, हम आपसे बड़ा कहेंगे, क्योंकि आपने तो पैसा ही दिया है। आपने शरीर कहाँ लगाया? आपने मनोयोग कहाँ लगाया? आपकी श्रद्धा कहाँ चली गई? आपने समय कहाँ निकाला? वह तो अपने बीबी-बच्चों को छोड़ करके भी आया है, अपना समय भी लगाता है और जो कुछ भी होता है सो भी योगदान देता है। अतः वह बड़ा हुआ कि नहीं हुआ? बेटे, हमारी निगाह में वह बड़ा हुआ।
कमाऊ पूत प्यारा होता है। कमाऊ पूत का मतलब यह है कि वह सारे घर को सँभालता है, माँ-बाप को सँभालता है, भाई-बहन को सँभालता है, इसलिए वह कमाऊ पूत कहा जाता है। इसलिए माँ भी ध्यान देती है, पिता भी ध्यान देता है। आप सब हमारे कमाऊ पूत हैं। हमें बहुत प्यारे लगते हैं। बेटे, आप प्राणों से भी प्यारे लगते हैं, लेकिन जब कभी भी कोई उलटी चाल चलते हैं तो बहुत बुरा लगता है।
उलटी चाल मत चलिए, लटके मुँह मत देखिए, किसी से नफरत मत करिए, किसी की और घृणा से मत देखिए। उसके अन्दर कोई कमियाँ हैं तो उन कमियों को हटाइए। यदि नहीं हटती हैं तो फिर उससे हाथ जोड़ लीजिए, यह भी तरीका है। हमारे तो एक-दो लड़के यहाँ से चले गए। हमने सँभालने की कोशिश की कि किसी तरीके से इनको सँभाला जाए।
इनकी त्रुटियों पर परदा डाला जाए, प्यार से, हर प्रकार के हर तरीके से जब देखा कि अब हार मान गए कि यह जो अन्दर के कुसंस्कार हैं, यह जाएँगे नहीं, हटेंगे नहीं तो फिर हमने कहा—बाबा! नमस्कार है। आशीर्वाद चाहे जितना ले जाए लखपति बनेगा तू, हमसे लिखवा ले।
जा तुझे लखपति न बना दें तो चाहे जो कहना, तू लखपति बन जाएगा, पर मिशन से मत टकरा, मिशन का दोहन नहीं करने देंगे। हम यह नहीं करने देंगे कि मिशन के नाम पर आप कहीं जाएँ और गुरुजी के नाम पर पैसा माँगें। वैसे अब आपके अन्दर श्रद्धा है ही नहीं, मिशन के लिए थोड़ी जा रहे हो, आप तो अपनी जेब भरने के लिए जा रहे हो।
गुरुदेव को धोखा न दें
अपनी जेब भरने के लिए जाओ, निकलो फिर तुम कहीं भी जाओ, खूब कमाना। नीति से कमाना, अनीति से कमाना, कैसे भी कमाना, तुम लखपति बन जाओगे, कोरे कागज पर लिखकर ले जाओ, हम लिखकर देंगे। बन जाएगा? हाँ बन जाएगा, पर यह मानकर चल कि तू अपनी जीवात्मा के आगे बिलकुल मर जाएगा। जो चेहरे का ओज आज तक चमकता था, वह अब नहीं चमकेगा, जिन्दगी भर नहीं चमकेगा।
किसी भी तरीके से वह नहीं चमक सकता; क्योंकि तूने उस सत्ता को धोखा दिया है, जिसने कि अपना सारा जीवन तिल-तिल करके गँवा दिया। उसको धोखा देगा तू? उसको धोखा दे करके कहाँ जाएगा तू? लखपति बन जा, चाहे तू करोड़पति बन जा, पर उसके आगे तू गिर गया, हमारे आगे गिर गया, जीवात्मा की दृष्टि से गिर गया, तू अपनी जीवात्मा के सामने भी गिर गया।
मैंने लड़कों से यह कहा कि जो मेरे यहाँ से एकाध विदा हुए हैं, जो इधर-उधर कुछ बातें भी कर रहे हैं तो करने दो। इससे हमारे मिशन पर क्या फरक पड़ता है, कुछ नहीं। हमारे कार्यकर्ता तो बड़े निष्ठावान हैं, इनके ऊपर क्या असर पड़ता है। कोई होगा तो एक होगा, तो हो जाएगा, हो जाने दो। जो मिशन को अच्छी तरीके से जानते हैं कि यह मिशन तपश्चर्या से बनाया गया है।
गुरुजी ने कितना तप किया है, कितना साधन जुटाया है, आपको मालूम नहीं है कि रात-दिन वे मिशन के लिए जुटे रहते हैं। एक दिन ऐसा हुआ कि मैं ऊपर गई। मैंने कहा आपकी आँखें कैसे लाल हो रही हैं? आपकी आँख बहुत लाल हो रही हैं। उन्होंने कहा कि आज मैंने इतना लिखा है कि आने वाला समय इसको समझेगा। मैंने कहा कि आने वाला समय तो समझेगा, लेकिन आपने तो बहुत लिखकर आँखें लाल कर लीं। उन्होंने कहा कि यह मेरा लिखना अन्तिम लिखना है, यह शब्द उन्होंने कहे।
जीवन भर गले गुरुदेव
सारी जिन्दगी इस समाज के लिए और राष्ट्र के लिए वह गलते ही चले गए, अपने को गँवाते हुए चले गए। न कभी अपना स्वास्थ्य देखा, न उन्होंने परिवार देखा कभी, जिम्मेदारियाँ तो सब निभाईं, इसमें तो दो राय ही नहीं है, लेकिन आमतौर से जिस तरीके से आप लोग चिपके रहते हैं, ऐसे वह कभी भी चिपके नहीं। उनको फर्ज-कर्तव्य तो याद रहा, जिम्मेदारियाँ भी याद रहीं, पर अध्यात्म मार्ग पर जो चल पड़े तो उसमें रोड़ा अटकाने की किसी की हिम्मत नहीं पड़ी और न ही किसी के सामने वे कभी झुके।
क्यों नहीं झुके? गलती नहीं तो झुकते क्यों और वैसे इतने नम्र भी थे कि कोई व्यक्ति कभी आ जाए तो उठ करके कुरसी लगानी पड़े तो कुरसी लगाते थे। यह नहीं कि आ रे! तू रख जाना, उनके अन्दर ऐसी भावना नहीं थी। उठ करके कुरसी लगाते थे, उठ करके बैठालते थे, किसी को पानी पिलाना होता तो स्वयं पानी पिलाते थे। उनके अन्दर बहुत विशेषता थी। उनका हृदय इतना उदार था कि किसी माँ का हृदय क्या उदार होगा?
बेटे, चलते समय की बात कह रही हूँ कि वसन्त पर्व से पहले मैं समझ गई थी। ऐसा था कि मेरी अलमारी में उनका फोटो रखा था और मेरा फोटो उनकी अलमारी में रखा था। मैंने कहा कि साहब! मैंने तो रखा है तो रखा है, पर आपने यह क्यों रखा है? उन्होंने कहा कि जब तुम्हारी अलमारी में मेरा हो सकता है तो मेरी अलमारी में तुम्हारा क्यों नहीं हो सकता है? मैं दिन में दो-चार बार देख लेता हूँ, यह उनके शब्द थे।
वसन्त पर्व से पहले एक कोई व्यक्ति आए, दिल्ली के थे। बड़ा मुँह लगा था। वह बोला कि गुरुजी! आप मुझे कुछ दे दो। उन्होंने कहा कि बेटा, मेरे पास तो कुछ है नहीं। नहीं गुरुजी! आपके पास जरूर होगा। उन्होंने अलमारी खोल करके एक डिब्बी में कुछ रुपये थे दो-पाँच-दस-बीस होंगे, ज्यादा नहीं थे। उनके पास रहते नहीं थे। बेटा यह दस-बीस रुपये पड़े हैं, उसमें सेफ्टी रेजर पड़ा था और मेरा फोटो रखा था, ज्यों-की-त्यों जो चीज उनके पास रखी थी, उन्होंने उसको दे दी और वह सर पर रख करके नाचता हुआ चला गया। मैं अपने मन में बिलकुल समझ गई कि अब यह शरीर बिछड़ने वाला है। जिन्दगी में कभी उन्होंने आज तक यह नहीं किया था, आज फोटो उठाकर कैसे दे दिया किसी को? मैं चुप हो गई, मुझे कुछ भावुकता तो आई जिस तरीके से अब आ रही है, पर मैं चुप हो गई।
वह उदार भी बहुत थे। यही प्रसंग नहीं है, हजारों प्रसंग उनके ऐसे हैं, जिसमें कि उनकी उदारता की कोई सीमा नहीं है। हर परिजन को वे ऊँचा उठाते हुए चले गए, उनके दुःख और पीड़ा का निवारण करते हुए चले गए चाहे अपने ऊपर कितना भी उन्होंने वजन लिया हो, लेकिन उनको किसी-न-किसी कष्ट में से अवश्य निकाला। जिस किसी का कोई ऐसा विपरीत भाग्य हो गया हो, कोई भाग्य ही साथ न दे तब बेटा कोई भगवान तो हैं नहीं कि हम निकाल दें।
भगवान कहाँ है? भगवान तो ऐसी सत्ता है, जो देखी नहीं जा सकती, लेकिन भगवान के जो पदचिह्नों पर चलता है, भगवान के जो सिद्धान्तों पर चलता है, वास्तव में वह अवतारी होता है। गुरुजी अवतारी थे। नहीं साहब! अवतारी नहीं थे। आप कैसे भगवान कह रही हैं? बेटा यह बताओ कि बुद्ध को हम भगवान कहते हैं, कृष्ण को हम भगवान कहते हैं, राम को हम भगवान कहते हैं, तो फिर गुरुजी को भगवान क्यों नहीं कह सकते? कृष्ण ने इतना काम किया था, राम ने इतना काम किया था, मुझे कहने दीजिए। राम ने केवल लंका को जलाया था, राक्षसों का विनाश किया था।
हाँ! अपने आप में बहुत बड़ा काम था, लेकिन बेटा गुरुजी का उससे भी ज्यादा काम है। आज जो भी राक्षसी प्रवृत्ति है, उसको हटाने के लिए उन्होंने जी-तोड़ श्रम किया है। यहाँ तक कि लोगों के प्रहार भी सहे, आलोचना भी सही। उन्होंने 'स्त्रियों का गायत्री अधिकार' नामक एक पुस्तक लिखी थी, तो मथुरा में इस कदर विद्रोह हो गया कि सनातनी तो अपनी तरह से विरोध करें और आर्य समाजी अपने तरीके से करें, पर करें वह दोनों।
यहाँ तक नौबत आ गई कि सन् 1958 के यज्ञ में ऐसा मालूम पड़ता था कि या तो बच्चों का अपहरण होगा अथवा यहाँ कोई दुर्घटना घटेगी। जैसा कि अभी आप का शपथ समारोह हुआ तो मुझे मालूम है कि वह पत्र किसने डाला। मुझे यह भी मालूम है कि किसने वह परचे चिपकाए। वह सब मुझसे छिप नहीं सकता है।
[क्रमशः अगले अंक में समापन]
साहस जुटाएँ, संकल्प जगाएँ
(उत्तरार्द्ध)
परमवन्दनीया माताजी के उद्बोधनों की यह मौलिकता है कि वे चिन्तनशील व्यक्ति को समाज के उत्थान के लिए उसके विवेक का प्रयोग करने के लिए प्रेरित करती हैं और उनकी सहृदयता का स्मरण भी प्रत्येक गायत्री परिजन को कराती हैं। अपने एक ऐसे ही प्रस्तुत उद्बोधन में परमवन्दनीया माताजी प्रत्येक गायत्री परिजन को साहस धारण करने एवं संकल्पित होने के लिए प्रेरित करती हैं। वे कहती हैं कि हमें पूज्य गुरुदेव के जीवन्त उदाहरण से प्रेरणा प्राप्त करने की आवश्यकता है और यह स्मरण रखने की आवश्यकता है कि जीवनपर्यन्त कितनी कष्ट-कठिनाइयों के मध्य पूज्य गुरुदेव ने गायत्री परिवार की स्थापना की एवं अखण्ड ज्योति को प्रज्वलित किया। वन्दनीया माताजी कहती हैं कि इन सब उपलब्धियों के पीछे का आधार एक ही है और वह है परमपूज्य गुरुदेव की स्वयंसेवक वृत्ति एवं आत्मविश्वास-ईश्वरविश्वास से परिपूर्ण उनका जीवन। आइए हृदयंगम करते हैं उनकी अमृतवाणी को.....
भगवान पर भरोसा
बेटे, उसमें एक पत्र आया, जिसमें लिखा हुआ था कि यदि आपने आयोजन किया तो हम बम फेंकेंगे और तम्बू में आग लगाएँगे। एक दिन तो जरा मेरा मन ऐसा ही चिन्ताजनक रहा। मैंने कहा कि हमें कुछ हो जाए तो कोई बात नहीं, पर हमारे इतने परिजन, हमारे इतने बालक आए हैं, सामान्य मौत से कोई जाए तो जाए, पर बेमौत क्यों जाए ऐसा लगा, पर दूसरे ही पल लगा कि अरे! जिसकी शक्ति है, उसकी शक्ति कराएगी। दो टके के व्यक्ति जो बकते रहते हैं इनसे वह चलेगा? विचार ही नहीं किया।
ऐसा अभूतपूर्व कार्यक्रम हुआ कि जिसमें आप लोग भी थे, बहुत सारे लोग थे। आपमें से जिन्होंने शपथ समारोह भी देखा, श्रद्धांजलि समारोह भी देखा, मैं उसी का उल्लेख कर रही थी कि सन् 1958 के यज्ञ में यह हो गया था कि जो वहाँ के व्यक्ति थे, जो कुछ विरोधी पार्टियां थीं, हमारा तो किसी से विरोध नहीं था, पर उनका तो विरोध चल रहा था।
उनको तो मालूम था कि हमारे पेट पर लात मारी जा रही है, पण्डे कहते थे कि साहब! यह करते हैं। हमारा कार्य गायत्री वाले करते हैं तो हमारे यहाँ कौन आवेगा? तो उनका अपने ढंग से विरोध था। सबका विरोध था और यह योजना थी कि पानी की जो टंकी है, इन टंकियों में जहर घोला जाएगा तो जितने भी आएँगे और पानी पिएँगे तो मरेंगे और जो खाद्य पदार्थ बनेगा उसमें जहर मिलाएँगे।
गुरुजी ने भी कह दिया कि देखा जाएगा, जो मिलावेगा वो भी देखा जाएगा। हमारा तो रखवाला भगवान है, वही हमारे साथ रहेगा, हमारा गुरु है, गायत्री माता हैं, बस, संसार में और कोई हमारा नहीं है और उसी का हमें सहारा है। अब हमें डरने की कोई भी आवश्यकता नहीं है। उन्होंने मुझसे कहा कि फिर हम डरें क्यों?
बच्चों की बात आई। एक ने टेलीफोन कर दिया कि आपके बच्चों का अपहरण होगा। हमने दोनों बच्चों को अलग कर दिया। समझ लीजिए कि जिस माँ ने, जिस बाप ने अपने बच्चों को अलग कर दिया हो और वह सालों अलग रहें तो उस माँ के ऊपर क्या बीतेगी, कोई माँ ही जान सकती है।
दोनों बच्चों को हमने अलग कर दिया कि ले जाओ जिसको चाहिए, वह ले जाओ, हम अपने पास नहीं रखेंगे, पर हमको जो कार्य करना है, करेंगे जरूर। कोई और होता तो रुक जाता, पर वह नहीं रुके। उन्होंने कहा कि कार्यक्रम होगा ही और वो हो करके ही रहा। उस समय यह कहा गया कि यह समारोह या तो महाभारत काल में हुआ होगा या अब हुआ है, ऐसा समारोह तो कभी नहीं हुआ।
मिशन फैलता चला जाएगा
अब तो मिशन इतना फैलता हुआ चला जा रहा है कि सारे विश्व में छा रहा है। अभी अश्वमेध के जो कार्यक्रम आपको दिए गए हैं, वह कार्यक्रम वहाँ भी दिए गए हैं, पर आने वाले समय में अब किसी भी देश को छोड़ेंगे नहीं और यहाँ हिन्दुस्तान में भी हम किसी भी प्रान्त को नहीं छोड़ेंगे। प्रान्त ही नहीं, बल्कि हम किसी भी घर को नहीं छोड़ेंगे जहाँ गुरुजी के विचार न पहुँचें। वह पहुँचेंगे हर हालत में पहुँचेंगे, चाहे आप सहयोग देना अथवा मत देना यह आपके ऊपर है। कोई एक आदमी सहयोग देगा या नहीं देगा, देखा जाएगा।
अरे बाबा! इतना बड़ा मिशन है। आप क्या कह रहे हैं? आपने देखा है मिशन कितना बड़ा है? आपने सुना-ही-सुना है। आप तो इतने बैठे हैं, उतने से ही समझ रहे होंगे कि इतना ही बड़ा है, अरे! लाखों-करोड़ों व्यक्ति हमारे साथ हैं। आज हम कह दें तो मरने के लिए भी तैयार हो जाएँगे, ऐसे-ऐसे होनहार बच्चे हैं हमारे साथ। किसी की हम कामना नहीं करते कि कोई बच्चा मरे, काहे को मरे, पर मैं तो यह कहती हूँ कि हमारे पदचिह्नों पर चलने के लिए, हमारे साथ चलने के लिए हर व्यक्ति आमादा है, आपको भी आमादा होना चाहिए। जो अभी आपके यहाँ अश्वमेध यज्ञ होंगे, जिनको कि तारीखें दे दी गई हैं, आपका कर्तव्य होता है कि आप मिल-जुल करके कार्यक्रम कीजिए।
संगठित रहकर काम करें
आप यह मत करना कि हम तो फलानी जगह के थे साहब! हमको तो मिला नहीं, अमुक जगह को मिला तो हम क्यों जाएँ। नहीं साहब! वह पूरे प्रान्त का है। कुछ बच्चों ने जब मुझसे यह कहा तो मैंने कहा कि नहीं, खबरदार! मुझसे तू यह मत कहना, वरन यह कहो कि माताजी हम जाकर के इसमें सहयोग दें, तो तुम्हारी तारीफ है। इसमें क्या बात है कि अरे फलानी जगह दे दिया, हमको नहीं दिया, अरे! अगले वर्ष तुझे भी दे देंगे कहाँ भागा जा रहा है, देखेंगे तू कितना करेगा, कर लेना।
अभी कुछ हमने सोचकर ही फेर-बदल किया होगा ऐसे क्यों नहीं समझता है। कोई-न-कोई खास वजह होगी, उसमें कुछ-न-कुछ, कोई-न-कोई रहस्य छिपा होगा, जिसकी वजह से हम नहीं दे रहे हैं। फिर तुम्हें दे देंगे तब कर लेना। अब तो जहाँ जो दिया गया है, सब मिलकर के काम करो। झाड़ जो होती है, जो बुहारने के काम आती है, उसकी सींकें जब इकट्ठी कर लो तो सारे कूड़े-कबाड़े को बुहार देगी और अकेली-अकेली सींक क्या कर सकती है? कुछ नहीं कर सकती।
संगठित होकर रहें
गुरुजी ने इसको परिवार का रूप दिया है— गायत्री परिवार, युग निर्माण योजना, युग निर्माण परिवार। उन्होंने परिवार का रूप दिया है, फिर आप व्यक्ति विशेष की तरफ क्यों जाते हैं। व्यक्ति विशेष की ओर मत जाइए, आप यह मत कहिए कि साहब! यह तो पटना का कार्यक्रम था।
पटना में दिया गया है तो सारे जितने भी बिहार के हैं, बिहार वालों का कर्त्तव्य है कि सारे लोग मिल करके काम करो, चलो माँ को सफल बनाने के लिए तन से, मन से और धन से लग जाओ, जुट जाओ।
अरे साहब! आपने तो वहाँ दे दिया बड़ौदा, गुजरात में, हमको तो आपने नहीं दिया। अरे! तुझको नहीं दिया तेरे प्रान्त को तो दिया है, चल पूरे प्रान्त का है। यह केवल बड़ौदा का नहीं है, रजनीकान्त का नहीं है और महेश्वर बाबू का नहीं है। पूरे गुजरात का है। आप सब मिल-जुलकर काम करिए, वह भी काम करेगा। आप भी काम करिए।
यह पूरे महाराष्ट्र का कार्यक्रम है, पूरे मध्य प्रदेश का कार्यक्रम है। यह नहीं है कि नहीं साहब! हमको तो कोरबा का दे दिया, बिलासपुर को दिया ही नहीं, पहले तो तिलक हमारा ही किया था। अरे! हमने पहले तिलक कर दिया था, अब हम ही तो कह रहे हैं, अब हम ही मना कर रहे हैं। अरे! यह क्या कह दिया आपने, आप मना क्यों कर रही हैं? आपने तिलक क्यों किया था? तिलक किया तो तेरी किसी अच्छाई के लिए किया था।
अब हमने दूसरे को दे दिया है तो दे दिया है हमारी इच्छा, हम चाहे जिसको देंगे तुम्हें तो सबको मिल करके काम करना चाहिए। मिल-जुलकर काम कीजिए। एक हो करके काम करिए, संगठित होकर के काम करिए, भाई-भाई मान करके काम करिए, पिता-पुत्र बन करके काम करिए, आप मिल करके काम करिए। यही मुझे आपसे आयोजन सम्बन्धी बातें कहनी थीं, इसकी बहुत बड़ी व्यवस्था आपको करनी पड़ेगी।
सामर्थ्यवान बनें
पहले ही मैं आपसे निवेदन कर चुकी हूँ कि खान-पान से लेकर कैसे आप व्यवस्था करेंगे। इसमें सब जुट जाएँगे तो कई दिमाग जब उसमें लग जाएँगे तो सही काम होगा। आप एक समिति बनाइए और उस समिति को लेकर के बैठिए। आपका दिमाग खुलेगा।
हम तो यह समिति बनाने जा रहे हैं कि हर शक्तिपीठ का निरीक्षण करो कि कैसे चल रही है कि नहीं चल रही है। कहीं तो झाड़ भी नहीं लग रही है, जाले लटक रहे हैं, जाने कैसे सप्ताह में एक दिन आरती हो जाती है। वहाँ क्या है कि प्रज्ञापीठ को नहीं खोलते। कथा तो खूब कहेंगे और उस कथा में यह नहीं बताएँगे कि शक्तिपीठ, प्रज्ञापीठ क्या होती है।
वह तो तुम्हारी उदरपूर्ति का साधन होती है। तुम चाहे कथा कहो, चाहे भागवत कहो, पर वहाँ गायत्री माता रो रही हैं और कह रही हैं कि इसमें हमें कैद कर दिया, इसमें हमें बैठाल दिया, पर यह भी नहीं बनता कि झाड़ तो लगा दें। यह सारा-का-सारा हिम्मत और श्रद्धा के ऊपर टिका हुआ है। हमारे अन्दर श्रद्धा नहीं होगी और हमारे अन्दर हिम्मत नहीं रहेगी तो हम दो कौड़ी के व्यक्ति हैं। दो कौड़ी के व्यक्ति नहीं होना चाहिए, सामर्थ्यवान होना चाहिए। सामर्थ्यवान हों, बलवान हों, आप हिम्मतवाले हो, शक्तिवान हो, आपके लिए कार्यक्रम को सफल बनाना कठिन नहीं होना चाहिए।
जैसा कि मैंने अभी आपसे कहा है कि आपके शपथ का नम्बर आवेगा। अभी आपको शपथ दिलाई जाएगी। यह मिट्टी बड़ी पवित्र मिट्टी है। यह वह मिट्टी है, जिस तरीके से रावी के तट पर शपथ ली गई थी कि स्वतंत्रता आन्दोलन के लिए हम शपथ लेते हैं कि हम स्वतंत्रता ला करके ही रहेंगे।
इसी तरीके से बंगाल में आनन्दमठ नामक एक उपन्यास लिखा गया था। उस उपन्यास को पढ़ करके ही लोगों में इस तरीके से स्वतंत्रता आन्दोलन की लहर आई कि समूचा जनमानस उमड़ पड़ा, जिसमें सुभाषचन्द्र बोस भी थे और महर्षि अरविन्द भी शामिल थे।
उसमें छोटे-बड़े सभी शामिल थे और देखते-ही-देखते स्वतंत्रता हमको मिल गई। लेकिन मिली कब? हमको ऐसे ही स्वतंत्रता नहीं मिल गई, इसमें बड़ी-बड़ी कुरबानियाँ दी गई हैं, बलिदान किया गया है।
लड़के गा रहे थे कि इस माटी के लिए भगत सिंह फाँसी पर चढ़ गए थे। इस माटी की सौगन्ध गुरुजी ने खाई थी कि मैं अपनी मातृभूमि की शपथ लेता हूँ कि जब तक स्वतंत्रता नहीं मिल जाएगी, तब तक मैं चैन से नहीं बैठूँगा। और फिर वह शपथ आगे चलती हुई चली गई कि मैं सौगन्ध खाता हूँ कि अपने देश के लिए, अपने समाज के लिए, मैं सारे विश्व के लिए जीवन भर लगा रहूँगा और वह उन्होंने पूरा किया।
भावनाएँ जगाएँ
यह मखौल नहीं है, यह मिट्टी नहीं है, यह बड़े सोने और हीरे-जवाहरात की गढ़ है। यह वह मिट्टी है, जो सिर से लगाई जानी चाहिए, हृदय से लगानी चाहिए कि इसमें वह सन्त और सपूत पैदा हुआ।
इसमें और भी लोग पैदा हुए, लेकिन वह ऐसे ही चले गए, जैसे अन्य प्राणी जाते हैं, लेकिन उन्होंने तो कमाल ही कर दिया। अरे वाह रे सन्त! उनको लाखों प्रणाम है, जिनने आध्यात्मिक क्षेत्र में और साहित्य क्षेत्र में इतना काम किया हो। उन्होंने अपने वजन से ज्यादा साहित्य लिखा, छह घण्टे नित्यप्रति उनकी उपासना होती थी।
लोग कहते हैं कि साहब! हमको तो उपासना के लिए समय ही नहीं मिलता। बेटे, कभी नहीं मिलेगा। आपको और किसी काम के लिए मिलेगा, जनसम्पर्क के लिए मिलेगा? नहीं साहब! हमको कहाँ समय मिलता है।
माताजी हम तो नौकरी से आते हैं—5.30 बजे छुट्टी हो जाती है, तब तक थककर चूर हो जाते हैं। फिर खाते-पीते हैं, 9.30 बजे तक जरा मनोरंजन-सा होता है, फिर सो जाते हैं। हाँ बेटा, जिन्दगी भर ऐसे ही सोते रहेंगे, ऐसे ही उठते रहेंगे। कभी तुम्हारे अन्दर कोई हौसला आ जाएगा क्या? नहीं आवेगा, क्योंकि इस देश के लिए और समाज के लिए आपके अन्दर जो उत्साह उमड़ना चाहिए, वह उमड़ता ही नहीं है। यदि उत्साह और उमंगपूर्वक भावनाएँ हों तो फिर हर काम के लिए समय निकल आता है।
गुरुजी के पास समय निकलता था कि नहीं निकलता था? लेखन भी करते थे, पत्र व्यवहार भी करते थे, अब तो स्थिति यह है कि पत्र इतने बढ़ गए जिससे कि इतने व्यक्ति हमें लगाने पड़े। मिशन बढ़ रहा है तो पत्र व्यवहार भी बढ़ रहा है। मैं बोलती जाती थी और वे लिखते जाते थे; क्योंकि मेरी राइटिंग जरा ठीक नहीं है, पर पढ़ने में ठीक है। मैं पत्रों को पढ़ती जाती थी, वे लिखते जाते थे। वे रोज पत्र लिख करके फिर गायत्री तपोभूमि जाते थे।
वहाँ लोगों से मिलते-जुलते थे, फिर दोपहर को आते थे। फिर उपासना, फिर भोजन और फिर गायत्री तपोभूमि जाना और फिर शाम को 4.00 बजे आना, जरा आप हिसाब लगाइए तो सही कितना उन्होंने काम किया।
एक मिनट का सवा हिस्सा भी उन्होंने कभी गँवाया नहीं। कभी गपशप में? नहीं, कभी नहीं गँवाया। हमेशा उनका मिशन-मिशन-मिशन, सारे विश्व का कल्याण चलता रहता था। कभी थोड़ी देर के लिए घूमने भी जाते थे, तब भी यही सब चलता रहता था।
मैं कहती थी कि साहब! घूमने आए हैं कि अभी भी आपके साथ मिशन लदा है, उसे थोड़ी देर के लिए तो उतारो। नहीं, फिर वही बातें होती थीं, खाना खाते वक्त में भी। मैं यह कहा करती थी कि यह बताइए साहब! आप भोजन कर रहे हैं या क्या कर रहे हैं? आप भोजन करते हुए भी इतनी बात करते हैं।
कभी-कभी उन्हें ठस्का लग जाता था तो मैं कहती थी कि देखो ठस्का लग जाएगा, आप इसके बाद बात कर लेना। मैं तो बात नहीं करूँगी, मैं तो भोजन करती हूँ तो भोजन में ध्यान लगाऊँगी। मैं ही जरा हँस जाती थी और कहती थी कि पहले आप भोजन कर लीजिए, पीछे बात कर लीजिएगा। उनको भोजन करने में भी बातें ही करना और सारे विस्तार से वही बातें करना कि किस तरीके से यह मिशन बढ़े और कैसे विश्व-कल्याण के लिए हमको क्या करना चाहिए ।
माटी की शपथ
समय-समय पर उन्होंने लोगों से अनुष्ठान कराए और स्वयं भी उन्होंने तपश्चर्या की। समय-समय पर सन् 1962 से लेकर अन्य समय में, जैसे-जो अष्टग्रही योग आया था, उस समय लोगों से अनुष्ठान कराए थे।
स्काईलैब जब गिरने वाला था, उस समय भी उन्होंने विशेष तपश्चर्या की थी और लोगों से कराई थी। समय-समय पर उन्होंने विशेष तपस्या की, हिमालय पर भी चार बार गए। उनके पास समय निकला कि नहीं निकला? उनके पास समय निकला। आपके पास समय है? बिलकुल आपके पास समय है।
इस माटी की मैं आपको याद दिला रही यह माटी बड़ी पवित्र है। यदि आप आज इस माटी की सौगन्ध-शपथ लेते हैं तो इसका निर्वाह करना, इसको पूजा के स्थान पर रखना और रोज माथे से लगाना और माथे से लगा करके यह प्रेरणा ग्रहण करना कि जो कार्य गुरुजी ने किया था, अब उन कार्यों में हमें हिस्सा बँटाना है, हमें आगे बढ़ाना है। जिस तरीके से गुरुजी ने कार्य किया था, उसी तरीके से हम भी करेंगे तो आप गुरुजी के बच्चे हो जाएँगे।
शेर का बच्चा शेर
बच्चे तो आप अभी भी हैं, पर देखो शेर का बच्चा शेर होता है, बकरी नहीं होता। बकरी कहीं होता है? नहीं, बकरी नहीं होता शेर का बच्चा शेर होता है और सन्त का बच्चा? उसको भी सन्त होना चाहिए।
ऋषि के बच्चे को ऋषि होना चाहिए, उसका अनुकरण करना चाहिए न कि पिल्ले के तरीके से रहना चाहिए। भेड़ों के तरीके से नहीं रहना चाहिए। आप ऋषि की सन्तान हैं न, तो उसके लिए चलेंगे, अपनी माँ के पदचिह्नों पर चलेंगे।
माँ गोद में तो खिलाती है, पर उस गोद का सम्मान भी तो रखो, उसको आप पहचानो भी तो सही। उस हृदय को आप नहीं पहचानेंगे और उसकी लाज आप नहीं रखेंगे तो फिर आप बेटे कैसे हो गए? बेटा तो अपने माँ-बाप के वचनों पर, पदचिह्नों पर चलता है न, तो बेटे आप गुरुजी के और हमारे पदचिह्नों पर चलना, आप इस माटी की कसम खा रहे हो।
अभी मैंने जो निवेदन किया था कि गुरुजी ने इस मिट्टी को हाथ में लेकर के जो शपथ ली थी, आजीवन उसका निर्वाह करते हुए चले गए। आप भी आज जो शपथ ले रहे हैं उस पर बने रहना, यह मत करना कि कल कायरों में आपकी गिनती गिनी जावे तो आप रख दीजिए। आप बिलकुल शपथ मत लीजिए।
मेरा विचार तो विशुद्ध रूप से आपको उस ओर दिग्दर्शन कराने का है, जिस ओर आपको चलना चाहिए। आपको ठगों के झाँसे में नहीं आना चाहिए।
चलो आपको एक कहानी सुनाती हूँ। हँसा भी देती हूँ, नहीं तो कहेंगे कि माताजी को हँसाने का काम नहीं आता। अच्छा तो हँसाना भी सुन लो।
तीन ठग थे और एक था ब्राह्मण। ब्राह्मण को कुछ सूझी तो उसने एक बकरी ले ली और उसे कन्धे पर रख लिया। जो ठग थे वो बारी-बारी से बोले कि यार! बकरी को तो ब्राह्मण लिए जा रहा है, फिर हमारा काम कैसे बनेगा? हम कैसे खाएँगे? यह तो ले जा रहा है। उन्होंने कहा कि पण्डित जी आप क्या ले जा रहे हैं? बकरी ले जा रहे हैं और क्या ले जा रहे हैं।
उसने कहा कि यह बकरी नहीं है। तो कौन है? अरे यह तो कुत्ता है। दूसरा आया और बोला कि पण्डित जी क्या ले जा रहे हो? बकरी है। उसने कहा कि बकरी नहीं, यह तो कुत्ता है, जिसे आप टाँगे फिर रहे हो। अब तीसरा आया और बोला पण्डित जी! आप कहाँ से आ रहे हैं? अरे फलानी जगह से आ रहे हैं।
उसने कहा कि यह आपके कन्धे पर क्या है? अरे कन्धे पर हम बकरी ले जा रहे हैं। उसने कहा कि बकरी नहीं, यह तो कुत्ता है, कुत्ता। अब पण्डित जी घबराए, क्योंकि सब एक स्वर से कह रहे हैं कि कुत्ता है, तो शायद इसमें कोई भूत-प्रेत होगा।
तो उन्होंने उसको फेंक दिया और भूत-भूत करके भागते हुए पण्डित जी अपने घर में घुस गए और वह तीनों जो ठग थे, उसको उठा करके चम्पत हो गए और बकरी को खा-पीकर के अलग कर दिया।
मैंने यह कहानी इसलिए बताई है कि यह बिलकुल आपके ऊपर लागू होती है कि आप जगह-जगह नहीं, एक ही जगह पर रहें। एक ही जगह पर आपका ध्यान केन्द्रित होना चाहिए, एक ही जगह आपकी निष्ठा होनी चाहिए।
नहीं साहब! हम तो डाल-डाल और पात-पात के बनेंगे, नहीं साहब! आप डाल-डाल और पात-पात के मत बनिए। फिर आप बहक जाएँगे, जैसे कि पूजा की चौकी पर अनेक देवी-देवता रखे रहने से होता है।
गुरुजी के साथ मैं बहुत जगह गई हूँ। मैंने तो और कुछ नहीं देखा, न किसी की गरीबी देखी न अमीरी देखी, एक बार जरूर किसी की पूजा की चौकी देखी। मैंने देखा कि उसकी पूजा की चौकी पर शंकर जी से लेकर और भैरव जी से लेकर चण्डी माता और जाने कौन-कौन माता हैं और जाने क्या-क्या रखा है। उसमें सबके लाल-लाल तिलक लगे थे। मैंने कहा कि धन्य है पुजारी तेरी भक्ति। तेरी भक्ति को क्या कहूँ, तेरा जैसा भक्त कोई और दुनिया में पैदा हुआ है क्या? क्या स्वरूप बिगाड़ रखा है सारे देवी-देवताओं का।
एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय
किसी एक पर तेरी निष्ठा होनी चाहिए—‘‘एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय’’। सब साधुओं को बुला लो कि तू भी आजा, तू भी मेरे यहाँ कथा कह जा, पर किसी से कुछ नहीं मिलता, खाली हाथ के खाली हाथ रह जाते हैं। खाली हाथ के खाली हाथ क्यों रहना चाहिए? जहाँ अपनी निष्ठा है, वहीं केन्द्रित कीजिए।
हमें नहीं मालूम है कि आपकी निष्ठा कहाँ है, पर जहाँ भी है, वहाँ एक तरफ ही तो रहनी चाहिए। आप हिन्दू हो जाओ या मुसलमान हो जाओ, एक तो हो जाओ, नहीं साहब! हम सब तरफ से लेंगे। सब तरफ मत चलिए, आप एक तरफ से चलिए।
गुरुजी एक तरफ ही चले थे। गुरु और गायत्री माता बस, दो के अलावा उन्होंने कभी कुछ नहीं देखा। गंगा को देखा तो गंगा जैसी शीतलता उनके अन्दर आती हुई चली गई। शंकर जी को देखा तो दूसरों के लिए जो हलाहल था, उसको खुद पीते हुए चले गए। नहीं साहब! शंकर जी को भाँग-धतूरा खिलाया और उनकी जेब में हाथ डाला और मालामाल हो गए।
बेटे! शंकर जी बहुत उदार तो हैं, पर भाँग, धतूरे पर नहीं देते हैं, श्रद्धा-निष्ठा पर देते हैं। वह देते इसलिए हैं कि आप परहित के लिए इसी तरीके से चलिए, जिस तरीके से आपको चलना चाहिए, जैसे कि गुरुजी परहित के लिए चले हैं। अपने हित के लिए नहीं चले, वह परहित के लिए चले हैं। अपने हित के लिए चले होते तो शायद एकाध गाड़ी हो गई होती, कोई मकान हो गया होता, कोई एक कोठी मोटी हो गई होती, दो-चार-छह नौकर-चाकर हो गए होते। इतने में ही मामला खतम हो जाता, पर बेटे वे परहित के लिए चले और सारे विश्व के कल्याण के लिए चले तो उनके वैभव का क्या ठिकाना।
जैसा मैंने निवेदन किया था कि दस साल में जो कार्य नहीं हुआ, वह दो साल में हो गया। सूक्ष्म और कारणशरीर में जाने से उनकी इतनी व्यापकता बढ़ती हुई चली गई कि आप उसका अनुमान नहीं लगा सकते।
जो भीड़ हमारी कभी गुरु पूर्णिमा पर या वसन्त पर्व पर रहती थी, वह आमतौर से रोज रहती है। इतनी भीड़ क्यों है? यह उस सूक्ष्मसत्ता की प्रेरणा है, उसका झकझोरना है। आज प्रत्येक व्यक्ति के अन्दर वह प्रेरित करते हुए जा रहे हैं और हर व्यक्ति को ऊँचा उठाते हुए जा रहे हैं। इतना जबरदस्त तूफान आ रहा है कि इस तूफान के साथ जो भी कोई चलेगा, वह लाभ उठा लेगा। यह तो बहती हुई गंगा है, जो गंगा में जाएगा और गोते लगाएगा उसी को फल मिलेगा। जो समुद्र में गोते लगाएगा, हीरा-मोती पाएगा और जो किनारे पर ही बैठा रहेगा, वह क्या पा सकता है? वह तो घोंघे पावेगा, वह हीरा-मोती कैसे पा सकता है। हीरा-मोती पाना है तो फिर उसके तरीके से आप चलिए।
हीरा-मोती का मतलब है—हमारे सुसंस्कार, सिद्धान्त, भावनाएँ, निष्ठा और श्रद्धा। हमारा मतलब है कि आप स्वयं बनिए, अपने परिवार को बनाइए, समाज को बनाइए और सारे विश्व को बनाइए। किस तरीके से आप बनाएँगे, यह सारा मार्गदर्शन पहले भी हमारे लड़के दे चुके हैं, हम भी दे रहे हैं और बाहर आपको साहित्य से मिल जाएगा।
एक लड़का राजस्थान का था। बहुत दिन पहले आया था। उसने कहा कि माताजी! मैं सन् 1960 से जुड़ा हूँ और सन् साठ से मैं अखण्ड ज्योति पत्रिका को पढ़ता हूँ। मैं एक-एक अक्षर को पढ़ता हूँ और उस अक्षर को पीता हुआ चला जाता हूँ।
क्योंकि लड़कों ने मुझे यह रिपोर्ट दी थी कि माताजी! एक सज्जन आए हैं, जो इतना बढ़िया बोलते हैं कि कमाल है। मैंने कहा अच्छा कौन-सा व्यक्ति है? मैंने उसे अपने पास बुलाया और कहा कि मैंने तेरी बहुत तारीफ सुनी है।
उसने कहा कि माताजी! मेरी तारीफ नहीं है, यह गुरुजी की तारीफ है। मैं तो उनके लेखों को पढ़ता हूँ और सारे लेखों को अपने अन्दर उतार लेता हूँ और वही मैं बोलता हूँ, दूसरा कहाँ से बोलूँगा। मैं अपनी तरफ से एक शब्द भी नहीं बोलता। यदि बोलता हूँ तो जैसे कि टेप रिकॉर्डर में कचरा फँस जाता है, समझ लो वैसे ही मेरी वाणी और भाषा लड़खड़ा जाती है। खाली मैं उनके लेखों को बोलता हूँ।
बेटे! वह तो बड़ा जबरदस्त बोलने वाला हो गया, आप भी हो जाएँगे आप पढ़िए तो सही। आप केवल पन्ना पलटकर देखते हैं, अन्तःकरण से नहीं पढ़ते। जिस दिन आप अन्तःकरण से पढ़ना शुरू करेंगे न, उस दिन देखना कि आप बिलकुल बदल जाएँगे। काया आपकी ऐसी ही रहेगी, लेकिन आप पूरा बदल जाएँगे, आपका आचरण बदल जाएगा, आपका व्यवहार बदल जाएगा, आपका चिन्तन बदल जाएगा और जब हमारा चिन्तन बदल जाता है तो चरित्र बदल जाता है, व्यवहार बदल जाता है और वातावरण भी बदलता हुआ चला जाता है।
जहाँ भी आप रहेंगे, वहाँ आपका स्वच्छ और पवित्र वातावरण बनता हुआ चला जाएगा। इन शब्दों के साथ बात को खतम करती हूँ। अब शपथ ग्रहण का समय आ रहा है, अब कर्मकाण्ड कराएँगे, फिर आप को शपथ दिलाई जाएगी।
आज की बात समाप्त