पात्रता का विकास
परमवन्दनीया माताजी के उद्बोधनों की यह मौलिकता है कि वे व्यक्ति के अन्तर्मन को झकझोरते भी हैं और साथ ही साधकों-याजकों-शिष्यों को एक उत्कृष्ट पथ का पथिक बनने के लिए प्रेरित भी करते हैं। अपने एक ऐसे ही प्रस्तुत उद्बोधन में परमवन्दनीया माताजी सभी श्रोताओं को अध्यात्म का मूल आधार- पात्रता अपनाने हेतु संकल्पित कराती हैं। वे सभी को स्मरण दिलाती हैं कि पात्रता का विकास जिसके भीतर होता है, वही भगवान के अनुग्रह का अधिकारी बन पाता है, क्योंकि भगवान मात्र भावों के भूखे हैं। वन्दनीया माताजी सभी साधकों को यह समझाती हैं कि अनुष्ठान का मूल आधार मनोमलिनता को नष्ट करना एवं स्वयं के भीतर की बुराइयों को निष्कासित करना है। इसी को दूसरे शब्दों में पात्रता भी कह सकते हैं। परमवन्दनीया माताजी मीरा, रैदास एवं भगीरथ के उदाहरण भी इसी हेतु प्रस्तुत करती हैं। आइए हृदयंगम करते हैं उनकी अमृतवाणी को...................
पात्रता का विकास
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ—
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।
हमारे आत्मीय परिजनो! दो घड़े रखे थे। एक घड़े का मुँह ऊपर की तरफ था और एक घड़े का मुँह नीचे की ओर था।
बारिश हुई तो जिस घड़े का मुँह ऊपर की तरफ था, वह भरता हुआ चला गया और जिसका मुँह नीचे की ओर था उसमें से पानी ढलता हुआ चला गया। जिसका मुँह नीचे की ओर था, वह बारिश को कोस रहा था और जो घड़ा भरा हुआ था, उससे ईर्ष्या और डाह करने लगा कि इसके अन्दर पानी कैसे आ गया और मेरे अन्दर क्यों नहीं आया।
बारिश बोली कि हे भले आदमी! कम-से-कम तुझे तो अपना मुँह सीधा करना था, पर तू तो अपना मुँह औंधा करके पड़ा था और हमको गाली दे रहा है। उस दूसरे घड़े को गाली दे रहा है; लेकिन अपने आप को नहीं दे रहा कि हमने मुँह सीधा क्यों नहीं किया? अपनी पात्रता को विकसित क्यों नहीं किया?
आपने अपने बारे में क्यों नहीं सोचा, दूसरों के बारे में सोचते रहे; लेकिन अपने बारे में यह नहीं सोचा कि हम किस ओर जा रहे हैं। किधर को हमारी दिशाधारा है, उस दिशाधारा को न सोच करके हम किधर ही चलने लगते हैं। यह दोष किसका है? यह अपना दोष है।
उसमें बारिश का दोष नहीं था, बारिश तो समान थी। वह तो पात्रता का है कि पात्र कितना बड़ा है और कैसा है? उतना ही उसके अन्दर आता हुआ चला जाता है।
श्रद्धा एवं पात्रता
यह कहानी किसके ऊपर है? यह कहानी आप सबके ऊपर है, हमारे ऊपर है, आपके ऊपर है कि जितना हम चाहें तो हम श्रेष्ठ बन सकते हैं और निकृष्ट-से-निकृष्ट बन सकते हैं। अर्जुन क्यों उठते हुए चले गए? क्या कारण था कि वे उठते हुए चले गए और दुर्योधन उठता हुआ क्यों नहीं चला गया, जबकि दोनों एक ही गुरु के शिष्य थे। फिर एक के साथ ऐसा पक्षपात क्यों और एक के साथ ऐसा दुराव क्यों?
गुरु तो पक्षपाती नहीं होता है; लेकिन शिष्य के अन्दर वे भावनाएँ, वे आस्थाएँ हैं कि वह चाहे तो उठता हुआ चला जाता है। शिवाजी उठते हुए चले गए, एकलव्य उठता हुआ चला गया तो कैसे चला गया? आखिर उनकी श्रद्धा और उनकी भावनाएँ उनको ऊपर उठाती हुई चली गईं।
बेटे! भगवान का अनुदान और वरदान है तो सही और वह सभी के लिए समान है, परन्तु अनुदान और वरदान को सँभालने के लिए भी तो कोई पात्रता चाहिए कि नहीं चाहिए। पात्रता चाहिए। यदि आपकी पात्रता विकसित हो गई है, तब वह आपको समान रूप से मिलता हुआ चला जाएगा, जैसे कि अनेक भक्तों को मिलता हुआ चला गया।
भाव के भूखे हैं भगवान
भगवान शबरी के यहाँ जाते रहे और विदुर के यहाँ जाते रहे। उन्होंने शबरी के जूठे बेर खाए और विदुर के यहाँ जाकर के केले के छिलके खाए। भगवान भूखे हैं तो सिर्फ भावनाओं के और श्रद्धा के भूखे हैं।
भगवान को और कुछ नहीं चाहिए, भगवान को आपकी श्रद्धा चाहिए, गायत्री माता को आपकी निष्ठा और श्रद्धा चाहिए। सुदामा निर्धन थे; लेकिन भगवान तो निर्धन नहीं थे। भगवान के तो अपार भण्डार भरे हुए हैं; लेकिन भगवान ने उनकी पात्रता को विकसित किया और पात्रता देखी कि इसके अन्दर पात्रता है कि नहीं है। जब सुदामा जी उनके यहाँ द्वारका में पहुँचे तो उन्होंने एक ही शब्द कहा कि तुम्हारे पास क्या है, लाओ दो। भगवान सबके यहाँ जाते हैं और माँगते हुए चले जाते हैं।
उनकी क्षुद्रता और उनकी निकृष्टता को वह त्यागते हुए चले जाते हैं और कहते हैं कि अपना दीजिए। सुदामा के पास थोड़े से चावल थे, जो उनकी पत्नी ने दिए थे और वे उन चावलों को बगल में दबाते हुए चले गए। उनका इतना विराट वैभव देखकर उन्होंने सोचा कि मित्र को मैं चावल दूँ तो कैसे दूँ।
मेरी पत्नी ने तो यह कहा था कि तुम्हारे बालपन के सखा हैं, तुम इन चावलों को उनको भेंट में देना; पर वह नहीं दे पा रहे थे। कृष्ण इस बात को ताड़ गए कि इनके पास है; पर संकीर्णता से भरा हुआ जो इनका मन हैं या तो वह नहीं दे पा रहा है या यह संकोचवश नहीं दे पा रहे हैं, तो उन्होंने कहा कि लाओ सुदामा जी क्या लाए हैं? हमारी भाभी ने क्या भेजा है?
उन्होंने कहा कि मेरे पास कुछ नहीं है, तो तुम्हारे पास यह क्या है? और तब सुदामा ने कहा कि ये चावल हैं। कहते हैं कि उन्होंने तीन मुट्ठी भर करके चावल खाए और फिर उनकी पत्नी ने उनका हाथ पकड़ लिया। उन्होंने कहा कि तीन मुट्ठी खाकर के तो आप सारा-का-सारा दिए जा रहे हो, चौथी को खाकर के तो आप क्या करेंगे। आप तीन मुट्ठी खाइए, तीनों लोकों के विजेता हैं आप, बस इससे ज्यादा मत खाइए और कहते हैं कि सुदामा का क्या-से-क्या होता हुआ चला गया।
सुदामा के बारे में यह कहानी सम्भव है आलंकारिक हो, पर इसके सिद्धान्त बिलकुल सही हैं। सिद्धान्तों में कमी नहीं है। अगर सिद्धान्तों में कमी होती तो फिर नरसी मेहता के लिए भी हम झूठा कहते, मीरा को भी हम झूठा कह सकते थे कि जिसने नारी-जागरण के लिए सारा जीवन लगा दिया था।
आपको मालूम है कि मीरा राज-पाट छोड़ करके दर-दर भटकती फिरी, घर-घर जाती रही और महिलाओं के जनजागरण के लिए उसने कदम उठाया। मीरा ने अपनी सुविधाओं को त्याग दिया। बेटे! सुविधाओं को त्यागना पड़ता है, बुराइयों को त्यागना पड़ता है और अच्छाइयों को लेना पड़ता है। आप नौ दिन के अनुष्ठान के लिए आए हैं।
क्या है अनुष्ठान?
अनुष्ठान क्या है? अनुष्ठान माने संकल्प होता है और संकल्प वह होता है जिसे हम दृढ़ता के साथ पूरा करते हुए चले जाते हैं। यदि संकल्प को हम पूरा नहीं कर पाए और कहीं भटक गए, हमारा दिमाग कहीं चला गया, जप कर रहे हैं और दिमाग जाने कहाँ-कहाँ जा रहा है? जाने कहाँ का मारा कहाँ जा रहा है, घर-गृहस्थी में घूम रहा है, कारोबार में जा रहा है, जाने किधर को जा रहा है तो फिर आप जप क्या कर रहे हैं? आप अनुष्ठान क्या कर रहे हैं? आप तो मखौल कर रहे हैं। आप मखौल मत कीजिए। क्या करें?
आप एक अबोध बच्चे का रूप धारण कीजिए, अपने मन में यह विचार कीजिए कि हम एक अबोध बच्चे हैं, छोटे बच्चे हैं और हम माँ की गोद में खेल रहे हैं। माँ की गोद में हैं अथवा यह भी कल्पना कर सकते हैं, यह भी भावना कर सकते हैं जैसे कि गुरुजी के अमृत वचन में कहा गया है।
आपने सुना होगा कि आप यह मानकर चलिए कि हम शान्तिकुञ्ज में हैं। शान्तिकुञ्ज माने—माताजी का पेट, इस गर्भ में हम पल रहे हैं। जब गर्भ में शिशु रहता है तो जो माता देती है, उसी को खाता है, उसी से पलता है। इन नौ दिनों के लिए आप बिलकुल अपनी मनोकामना से रहित होकर उपासना कीजिए, फिर देखिए कि आपको कितना आनन्द आता है।
आपको बहुत आनन्द आएगा और आपको उससे शान्ति मिलती हुई चली जाएगी। इसलिए शान्ति मिलती हुई चली जाएगी कि आप खाली हो गए ना, जब तक आप खाली नहीं होंगे, तब तक आपको कुछ नहीं मिलेगा। बाँस जब तक खाली नहीं होता है, तब तक किस तरीके से उसकी बाँसुरी बन सकती है, कैसे उसमें वंशलोचन पैदा हो सकता है? स्वाति नक्षत्र की बूँद हर जगह गिरती है; लेकिन कहीं सफलता नहीं मिलती।
पात्रता और सफलता
जहाँ कहीं भी पात्र खाली होता है, वहीं सफलता मिलती है। सीप औंधी पड़ी होगी, तो बताइए मोती कैसे पैदा होगा? सीप का मुँह खुला होगा, ऊपर की ओर होगा तो ही तो उसमें से मोती पैदा होगा। वंशलोचन तभी पैदा होगा, जब बाँस अन्दर से खोखला होगा। स्वाति की बूँदें गाय के कान में पड़ेंगी, तभी तो गोरोचन पैदा होगा। इस तरीके से पहले भक्तों को अपना हृदय खाली करना पड़ता है।
मनोमलिनता खाली करनी पड़ती है और जो अपनी जीवात्मा पर पड़े हुए मल और विक्षेप हैं, वह समाप्त करने पड़ते हैं। यदि वह समाप्त नहीं किए गए हैं तो अंगारे की भाँति हो जाएगा। अंगारे पर राख की परत पड़ी होती है, जो होती तो सफेद है, पर उस परत को जब तक हटाया नहीं जाएगा, तब तक वह दबा रहेगा। उसे छूते हुए गरमी नहीं आएगी; लेकिन जब हम उस परत को हटा देते हैं तो उसमें से वह धधकता हुआ अंगारा सामने आता है और गरमी देता है।
लकड़ी इधर-उधर पड़ी रहती है और उन्हीं लकड़ियों को जब हम अग्नि में डाल देते हैं तो अग्नि का स्वरूप हो जाता है। इसी तरीके से भक्त का है। भक्त जब भगवान से जुड़ जाता है तो उसका स्वरूप उसमें आने लगता है। वे अच्छाइयाँ भगवान में जो विद्यमान हैं, वे भगवान की अच्छाइयाँ भक्तों में आती हुई चली जाती हैं।
इसकी एक ही पहचान है कि इनके अन्दर बुराइयों का निष्कासन हुआ अथवा नहीं हुआ। इनकी बुराइयों का निष्कासन नहीं हुआ है और अच्छाइयों को इन्होंने नहीं लिया है, तब तक इनको भक्त कैसे मान लिया जाए। तब तक वह भक्त नहीं माना जा सकता है। वह भक्त तभी होगा, जब अनुकरण करेगा। ये शिक्षाएँ हैं, ये भगवान के अनुदान और वरदान हैं, जो समय-समय पर भक्त को मिलते रहे हैं।
मेरे तो गिरिधर गोपाल
मीरा को मिला? हाँ! मीरा को मिला, मीरा ने कहा—"मेरो तो गिरिधर गोपाल दूसरो ना कोई।" मेरा तो गिरिधर गोपाल है, दूसरा कोई इस संसार में नहीं है। जब तक ये भावनाएँ नहीं होती हैं, तब तक उसको मिलेगा नहीं।
आप गुरुजी से जुड़े जरूर हैं; लेकिन यदि अन्तःकरण से जिस दिन जुड़ जाएँगे तो आपके अन्दर गुरुजी के अन्दर की वे सारी-की-सारी जो विशेषताएँ हैं, वे विशेषताएँ आपके अन्दर आती हुई चली जाएँगी।
कच्चे मन से जुड़ना अलग होता है और पक्के मन से जुड़ना बिलकुल अलग होता है। पक्के मन से यह होता है कि जो कुछ है, सो तेरा है— "तेरा तुझको सौंपता क्या लागे है मेरा।" तेरा तुझको सौंप रहा हूँ, जो कुछ भी मेरा है, वह सब तेरा है। जहाँ सब तेरे की बात आ जाएगी, वहीं भगवान भी यह कहेगा कि बेटा जो कुछ मेरा है, वह सब तेरा है। फिर सूरदास के तरीके से लकड़ी लेकर के भगवान आगे-पीछे चलेगा, फिर भगीरथ के तरीके से आपको वरदान मिलेगा।
भगीरथ को वरदान मिला और माँ गंगा को लाने में वे सफल हो गए। कौन-सी गंगा? पतितपावनी गंगा, जो पापों को हरने वाली है, वह अनवरत बहती हुई चली जाती है। बेटे! आप इसका शिक्षण कब ले पाए? गंगा नहाने तो गए, ऊपर का मैल तो उतारा; लेकिन भीतर की जो पवित्रता थी, उसको हम ग्रहण नहीं कर पाए। जब तक हम भीतर की पवित्रता को ग्रहण नहीं करेंगे, तो फिर हम निर्मल कैसे हो गए, फिर हम पवित्र कहाँ हुए। फिर हम अपवित्र ही रहे; क्योंकि हमने अन्दर की बुराइयों को और मलिनताओं को छोड़ा नहीं।
मन चंगा तो कठौती में गंगा
यदि हम मलिनताओं को छोड़ देते तो इस गंगा के तरीके से निर्मल और स्वच्छ हो जाते, गतिशील हो जाते। तो जिस तरह से सारे समाज को, सारे राष्ट्र को वह नहलाती हुई चली जाती है, घर-घर के मैल उतारती हुई चली जाती है, इस तरीके से यदि भावनाएँ आई होतीं तो हमें सच्चे रूप में गंगा नहाना आ जाता और फिर गंगा आपके अन्दर में प्रवेश कर जाती, जिस तरीके से रैदास के अन्दर प्रवेश कर गई थी।
कहते हैं कि रैदास ने फूल भेजे थे और उन्होंने यह कहा था कि यह फूल माँ गंगा के हाथ में देना। कहते हैं कि माँ गंगा ने अंजलि के तरीके से दोनों हाथ फैला दिए और वह फूल दोनों हाथ में आ गए। पता नहीं आ गए कि नहीं आ गए, पर यह सही हो सकता है। उनका एक और उदाहरण है कि "मन चंगा तो कठौती में गंगा"। जो उनका कार्य था, वह अपने फर्ज और कर्तव्य को निभाते हुए चले गए।
उन्होंने कहा कि यह भगवान का कार्य है, यह माँ गंगा का कार्य है और जो कार्य मैं कर रहा हूँ, इसको छोड़ करके मेरा जाना ठीक नहीं है। माँ से कह देना कि तुम्हारा पुत्र बहुत व्यस्त है, इसलिए वह नहीं आया है।
कहते हैं कि किसी का एक कंगन खो गया था तो उन्होंने रैदास को चैलेंज किया कि तुम भगवान के भक्त हो तो बताओ कि हमारा जो कंगन खो गया है, वह कहाँ से आएगा? उनके ऊपर यह व्यंग्य था।
भगवान की कुछ देन थी, गंगा माँ की करुणा थी तो कहते हैं उन्होंने कठौती में से निकालकर एक कंगन उनको दे दिया। पता नहीं यह तो चमत्कारिक बातें हैं, मैं कैसे इनको अपने मुँह से कहूँ—शोभा नहीं देता। नहीं है तो चमत्कार हो जाएगा, पर यह चमत्कार नहीं, बल्कि भक्तों की जो विशेषता थी, जो उनको अनुदान और वरदान के रूप में मिला था, सो उन्होंने दे दिया। इसी तरीके से एक उदाहरण और है।
एक सन्त थे और किसी एक कन्या का विवाह था तो एक व्यक्ति सन्त के पास आया और उसने कहा कि हमारी बेटी की शादी है तो आपके यहाँ कुछ हो तो हमें कुछ दे दीजिए। उन्होंने सारा घर देखा, कुछ नहीं था, पत्नी सो रही थी, उसके दोनों हाथों के कंगन थे, तो उन्होंने चुपके से एक कंगन उतार करके उस अतिथि को दे दिया और कहा कि जा भाई और तो कुछ नहीं है मेरे पास, यह कंगन है, इस कंगन को तू ले जा, दूसरा नहीं उतार पाया।
इतने में उनकी पत्नी की आँख खुल गई और मुस्कराते हुए पत्नी ने कहा कि ऐसे अच्छे कार्य के लिए आप यदि दे रहे हैं तो यह दूसरा कंगन आप ले लीजिए, दूसरा भी कंगन ले जाइए।
[क्रमशः अगले अंक में समापन]
परमवन्दनीया माताजी की अमृतवाणी
पात्रता का विकास (उत्तरार्द्ध)
परमवन्दनीया माताजी के उद्बोधनों में यह एक अद्भुत सामर्थ्य सन्निहित है कि जहाँ एक ओर वे साधना-पथ के किसी भी पथिक का आध्यात्मिक मार्गदर्शन करते हैं तो वहीं दूसरी ओर जीवन की सामान्य समस्याओं से प्रताड़ित व्यक्तियों को भी अपने जीवन-पथ पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। अपने एक ऐसे ही प्रस्तुत उद्बोधन में वन्दनीया माताजी साधना-पथ पर सफलता अर्जित करने के लिए पात्रता के महत्त्व पर प्रकाश डालती दिखाई पड़ती हैं। वे श्रद्धा एवं पात्रता का महत्त्व, मीरा से लेकर सन्त रविदास के उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट करते हुए कहती हैं कि साधना में सफलता मात्र वे ही प्राप्त कर पाते हैं, जो स्वयं को उन अनुदानों के लिए सत्पात्र बना पाते हैं। इस हेतु वे हर गायत्री परिजन को पूज्य गुरुदेव के जीवन से प्रेरणा प्राप्त करने को कहती हैं। आइए हृदयंगम करते हैं उनकी अमृतवाणी को.......
गाँधी जी का उदाहरण
बेटे, ये उदाहरण उदारता के लिए दिए गए हैं, पर इसका मतलब यह नहीं है कि हम घर से फकीर बन जाएँ और घर को बिलकुल खाली कर दें, फर्ज और कर्तव्यों को ध्यान में न रखें, लेकिन पड़ोस की तरफ भी हम देखें कि आखिर हमारे पड़ोसी किस अभाव में जीवन काट रहे हैं और हम शानदार जीवन काट रहे हैं। गाँधी जी का उदाहरण सुना है न कि गाँधी जी जा रहे थे तो उन्होंने एक महिला को देखा, जो कि बड़ी पुरानी साड़ी पहने हुए थी। साड़ी फट रही थी। उन्होंने कहा कि बहन इस साड़ी को तुम धोती नहीं हो। उसने कहा कि आपने बहन कहा है तो आप यह बताइए कि मैं साड़ी को धोऊँ कैसे? मेरे पास जब एक ही साड़ी है तो मैं एक साड़ी को धोऊँगी कैसे?
उनको बात समझ में आ गई। उनके थैले में उनकी एक धोती रखी थी, उन्होंने कहा कि ले बहन! यह धोती तू ले जा और इस धोती से तू अपना तन ढक ले और इस धोती को तू धो ले। उसी दिन से गाँधी जी ने आधी धोती पहनना शुरू किया। इसी तरीके से जापान में एक सन्त हुए हैं 'कागावा' जिन्हें जापान का गाँधी कहते हैं। गाँधी जी के तरीके से उनकी भी विचारधारा थी। गाँधी जी अपने राष्ट्रपिता हो गए और वे भी जापान के राष्ट्रपिता हो गए।
स्वार्थ से नहीं बेटा, स्वार्थ यदि मन में होगा तो फिर स्वार्थ के वशीभूत होकर के हम कुछ नहीं पा सकते। स्वार्थ तो फिर स्वार्थ ही रहेगा, हमें परमार्थ की ओर कदम बढ़ाना चाहिए, हमारी उपासना सफल तभी होगी।
उपासना का मर्म
उपासना का मतलब क्या है? एक ही मतलब है कि जीवात्मा परमात्मा में मिल जाए। यह समर्पण है। उपासना भगवान के लिए की जाती है और साधना अपने लिए की जाती है। भगवान के लिए उपासना और अपने लिए साधना अर्थात अपने व्यक्तित्व को बनाना। व्यक्तित्व को बनाने के बाद फिर आती है समाज-सेवा—जिसको आराधना कहते हैं। आराधना के बगैर हमारी साधना अधूरी है, हमारी उपासना अधूरी है।
यदि हमने समाज-सेवा नहीं की है तो यह दोनों चीजें हमारी अधूरी हैं और यदि हमने की है तो उससे हमारा सम्पूर्ण व्यक्तित्व बनता है। उस व्यक्तित्व से सारे समाज को, सारे राष्ट्र को हमारा सहयोग मिलता हुआ चला जाता है और उसके बदले में हमें सम्मान और सत्कार मिलता हुआ चला जाता है—यह आपको मालूम है।
भली भाँति मालूम है कि जितने भी हमारे सन्त हुए हैं, जिनको अनुदान और वरदान मिले हैं, वे स्वयं तो निहाल हुए हैं, लेकिन उनके पास कुछ नहीं रहा है। बेटे, गुरुजी के पास कभी भी कुछ नहीं रहा, एक नया पैसा तक उनकी जेब में नहीं रहता था। मिशन के लिए उन्होंने लाखों खर्च किए और अपने लिए? अपने लिए वे एक नया पैसा खरच नहीं करते थे।
पूज्य गुरुदेव का उदाहरण
मैं आपको एक बात बताऊँ, शुरू- शुरू की बहुत पुरानी बात है कि मुझे लेने के लिए आगरा गए तो कुछ पड़ोस की जो लड़कियाँ थीं, वे मुस्कराईं और उन्होंने देखा कि गुरुजी जो धोती पहने हुए हैं, उसमें थेगड़ी लग रही है। उन्होंने कहा कि जब इनको मालूम था कि हम लेने जा रहे हैं तो फिर ऐसे कैसे आए। वे लड़कियाँ जो थीं, मुस्कराईं। मैंने लड़कियों को डाँटा और कहा कि तुम यह मत समझो कि हम गरीब हैं।
नहीं, हम भिखमंगे नहीं हैं, गरीब नहीं हैं, पर हमारा रहन-सहन जो है, वह गरीबों का-सा है, क्योंकि हमने बना रखा है। जब हमने बना रखा है, तो फिर तुम क्यों हँसती हो? उनका जो रहन-सहन था, वह मैंने आपको बताया है।
बेटे, कई बार मेरा साथ जाना हुआ तो मैंने देखा कि एक बार उनकी धोती फट गई मैंने तो धो करके, साफ करके, अच्छी देख करके रखी थी, मुझे क्या मालूम कि यह इतनी घिस गई है कि पहनते ही फट जाएगी। वह पहनते ही फट गई तो मुझे अपने ऊपर बहुत क्षोभ आया कि मैंने धोती को देखा नहीं, कम-से-कम पलट करके देखती तो सही। तो मैंने उनसे कहा कि आप ऐसी धोती पहने हुए हैं, आप दूसरी बदल लें।
उन्होंने कहा कि देखो हम मीलों आगे निकल आए हैं, अब मीलों पीछे जाएँ तब धोती को बदलकर आएँ। इससे तो ऐसे ही भली है, कोई नहीं देखता है। लोग धोती को देखते हैं या हमारे व्यक्तित्व को देखते हैं। व्यक्तित्व होता है कि यह बनावटीपन होता है? बनावटीपन उनके जीवन में जरा भी नहीं था। उपासना की तो उन्होंने हृदय से की, साधना की तो उन्होंने हृदय से की और आराधना की तो उन्होंने हृदय से की—जिसमें आप लोग जुड़े हुए हैं।
इनमें कई एक तो पुराने बैठे हैं, जो कभी मिलते थे, उनसे बातचीत करते थे। क्या वे जिन्दगी भर भूल पाएँगे? बेटे! वे नहीं भूल पाएँगे। उनको कोई भी नहीं भूल सकता है, जो भी कोई उनसे जुड़ा है और उनके समीप बैठा होगा, वह कभी भी नहीं भूल सकता। उनके अन्दर यह विशेषता थी, उनके अन्दर वह चिपकने वाला माद्दा था, जिससे कि व्यक्ति चिपकता हुआ चला जाता था और यह कहता था कि यह तो हमारी माँ हैं। माँ का जैसा प्यार उनके हृदय में लबालब भरा हुआ था।
दीन-दुःखियों की सेवाएँ अपने ऊपर कोई ली होगीं तो ली होगी, लेकिन दूसरे को उन्होंने हमेशा बचाया होगा, उनको हिम्मत देने वाली बात कही होगी। उन्होंने हमेशा हिम्मत देने वाली बात कही है, गिराने वाली बात कभी भी नहीं कही।
गुरुदेव ने सबको उठाया
जरा-जरा से लड़के जिन्हें उन्होंने उछालकर कहाँ-से-कहाँ रख दिया। जो जाते हैं तो उनका सम्मान होता है, गले में माला पड़ती है। आप जानते हैं कि उन्होंने इस समाज और राष्ट्र को कितना दिया है तो उसके बदले में पाया भी है। श्रद्धा पाई और शरीर के न रहने पर भी लोगों के मन में अपार श्रद्धा है।
आप कहेंगे कि वह श्रद्धा कैसे देखी जाए कि लोगों में है या नहीं है? तो आप कहीं जाना, जहाँ कि अश्वमेध यज्ञ हो रहे हों, वहाँ आप जाना तो आपको मालूम पड़ेगा कि किस कदर जनसमूह उमड़ पड़ता है, जहाँ सुनता है कि माताजी आ रही हैं, वहाँ इस कदर जनसमूह उमड़ पड़ता है कि मैं आपसे क्या कहूँ। हम उनको क्या देकर के आते हैं जरा बताना।
गरीब लोग बेचारे हमसे मिल भी नहीं पाते, उनकी इच्छा होते हुए भी पास तक नहीं आ पाते हैं। इससे मन में बड़ी पीड़ा होती है कि हमारा यहाँ आना बेकार रहा कि हम मिल भी नहीं पा रहे हैं। पर इन लाखों व्यक्तियों से कैसे मिला जा सकता है? मिला भी नहीं जा सकता तो फिर यह कहना पड़ता है कि आप खुली गाड़ी लेकर के आइए, ताकि यह बच्चे हमारी शक्ल ही देख लें तो उसी से अपना मन समझा लेंगे।
भिलाई में तो वह भी नहीं हुआ था। उन्होंने कहा कि माताजी यहाँ खुली गाड़ी में आपको देख कर लोग उसी पर चढ़ बैठेंगे। इनकी भावनाएँ इस कदर उछल करके आ रही हैं कि छोड़ेंगे नहीं, आपका चलना मुश्किल हो जाएगा। बिलकुल ऐसा ही होता था, तब भी लड़कों की निगाह बचा करके मैं काँच को जरा नीचे कर देती थी और इसी में से हाथ हिला दिया करती थी।
इसी में से उन्होंने शक्ल देख ली और जब भीड़ होती थी तो फिर से लड़के झट से शीशा ऊपर कर देते थे। इसलिए कर देते थे कि अब तो यह मानेंगे नहीं तो किस कदर बचाव करेंगे पर मैं बताती हूँ कि मेरे दिल में बहुत पीड़ा होती थी। बेटे! अभी मैंने श्रद्धा की बात कही कि किस कदर शरीर न रहने पर भी लोगों में कितनी अपार श्रद्धा है कि जो भी बात कही गई है, वह बात पूरी होती चली जाती है। जहाँ यह कहा कि अश्वमेध यज्ञ होगा, वहीं लोग जी-जान से टूट पड़े और उनमें शर्त लग गई कि हमारे यहाँ होना चाहिए, हमारे यहाँ होना चाहिए।
श्रद्धा का प्रवाह
जब मैंने उनके अन्दर झाँक करके यह देखा तो मैं थोड़ा कण्ट्रोल करने लगी कि जब पास में हो रहा है तो तेरे यहाँ कैसे दे दें। तेरे यहाँ पीछे देंगे, अभी नहीं, थोड़े दिन बाद देंगे। देंगे तो सही, पर तुम्हें थोड़े दिन बाद देंगे, अभी नहीं देंगे। साहब! लोगों में इतनी श्रद्धा क्यों, कैसे हो गई? इसलिए हो गई कि वे गायत्री माता के भक्त थे, गायत्री माता का साक्षात्कार था, गायत्री माता उनके अन्दर में समायी हुई थी, इसलिए उनके प्रति लोगों की श्रद्धा थी।
उन्होंने लोगों की जो सेवा, व्यक्तियों की जो सेवा की यह उसका बदला है। जो सेवाएँ और सहायताएँ उन्होंने कीं, उनके बारे में आप जानते नहीं हो। कल भी एक लड़की आई थी और उसने कहा कि माताजी देखिए मुझे कैंसर हो गया था और मैं कैंसर से बच गई। बेटे! हम भगवान तो हैं नहीं कि हम सबको बचा लेंगे, कैसे बचा लेंगे भाई?
भगवान भी जब प्रारब्ध को नहीं पलट सके तो हम कैसे पलट दें, पर लग जाता है जिसको लग जाता है, नहीं लग जाता है तो नहीं लगता है। लग जाता है, हाँ लग जाता है, सैकड़ों को, हजारों को लगा है, लाखों को लगा है, जो कि ऐसे पीड़ा-पतन में पड़े हुए थे और उनको कहाँ-से-कहाँ ले जा करके रख दिया।
वे अपने को धन्य मानते हैं, बेटे लोगों की, व्यक्तियों की श्रद्धा है और जनसमूह के लिए उनका पुरुषार्थ था, उनकी भावनाएँ थीं। उनकी जो भावना पीड़ा-पतन के निवारण के प्रति थी, वह है सारा-का-सारा रहस्य, उसको जब तक आप नहीं समझ पाएँगे, तब तक आपकी उपासना सार्थक नहीं होगी।
बगुलाभगत न बनें
गायत्री मंत्र में चौबीस अक्षर हैं और उसके प्रत्येक अक्षर के पीछे एक सिद्धान्त है, एक भावना है, उसमें एक शिक्षण है। उन चौबीस अक्षरों में जो भावार्थ भरा पड़ा है, उसको आप हृदयंगम कीजिए और फिर उस पर आप अमल कीजिए। अमल यदि किया गया है तो फिर आपका समग्र व्यक्तित्व बनता हुआ चला जाएगा और अगर आपने ध्यान नहीं दिया, केवल माला ही सटकाते रहे तो फिर आप बगुलाभगत हो जाएँगे।
बगुलाभगत जानते हो क्या होता है? बगुला भगत ऐसा होता है कि बिलकुल चोंच नीचे किए नदी के किनारे बैठा रहता है और जहाँ उसको मछली दिखाई पड़ी कि चोंच उठाई और गपककर मुँह में ले जाता है। हमारे जो स्वार्थ हैं, वे निष्कासित नहीं होते, मनोकामनाएँ ढेर सारी हैं, न जाने क्या-क्या मनोकामनाएँ हैं, सबको निकालकर फेंको। आज पहला दिन है, सब मनोकामनाओं को आप यहीं हमारे पास रख जाओ।
दोष-दुर्गुण से मुक्त हों
एक दिन इस पर आपके लिए व्याख्यान भी होगा, नीचे लेक्चर होगा, उसमें आपको दो कागज दिए जाएँगे। एक वह दिया जाएगा, जिसमें कि आपकी जाने-अनजाने में जो बुराइयाँ होती रहती हैं, आप जिन बुराइयों की ओर प्रेरित होते रहते हैं, जो कर्म नहीं होने चाहिए, वह हमारे शरीर से, मस्तिष्क से होते रहते हैं।
दूसरा कागज होगा, जिसमें कि आप अपनी कष्ट-कठिनाइयाँ लिखेंगे। वह हमारे पास आ जाएगा और जो कुछ भी हम कर सकते होंगे, जो भी गुरुजी का दिया हुआ है, उसमें से जो कुछ भी आप के पल्ले पड़ेगा तो हम जरूर आपको देंगे और आपकी मदद करेंगे।
बेटे, आप बिलकुल खाली हो जाइए। इस वातावरण में आप पकिए, यह कुम्हार का अवा है। कुम्हार के आँवें में बरतन पकते हैं। यदि बरतन कच्चा रह गया है तो उसमें से पानी निकल जाएगा, क्योंकि वह कच्चा रह गया है। पक गया है तो पानी उसमें ठहरेगा। इसी तरीके से अपने भाग्य को दोष नहीं देना है, बल्कि अपनी क्रिया को दोष देना है कि हम जो क्रिया करते हैं, जो हमारे अन्दर दोष और दुर्गुण हैं, उनको धिक्कारिए।
आप उसको निकालिए, नहीं तो वही कहावत आ जाएगी कि चलनी में दुहे और कर्म टटोले। कर्म को, भाग्य को कोसता है और अपने कर्तृत्व को नहीं देखता कि हमारा कर्तृत्व क्या है। अपने कर्तृत्व की ओर देखिए, फिर देखिए आपका कैसा शानदार जीवन होता है। इतना शानदार जीवन होगा कि आप भी निहाल हो जाएँगे और समीपवर्ती जो भी आपके सम्पर्क में आएँगे, वे भी निहाल हो जाएँगे।
मेरी चाल देख लो
गुरुजी एक बात कहते थे, अब मैं भी हँसा दूँ आप लोग इतनी देर से गम्भीर होते जा रहे हैं। गुरुजी एक उदाहरण दिया करते थे। मैंने एक बार कहा कि इसका मतलब क्या होता है आप जरा मुझे बताइए। उन्होंने कहा कि माने-मतलब से क्या करना है, मुझे तो सब चीज अध्यात्म से जोड़नी है। वे एक उदाहरण बहुत ही देते थे। कौन-सा देते थे? यह कहते थे—"मेरे पैरों में घुँघरू बँधा दो और फिर मेरी चाल देख लो"।
मैंने कहा कि यह तो गाना है। उनको गाना तो आता नहीं था, मुझे तो भी थोड़ा-बहुत टूटा-फूटा आता है, पर उनको गाना नहीं आता था। इसलिए उन्होंने मुझे गाना सिखाया कि तुम सीख लो मुझसे तो नहीं आया। मैंने तो तानपूरा लिया और थोड़े दिन में सीख लिया। सिखाने वाला बोला कि गुरुजी आप रहने दें, माताजी सीखना चाहें तो वे सीख सकती हैं।
उन्होंने कहा कि तुम्हें कैसे मालूम कि माताजी सीख सकती हैं और मैं नहीं सीख सकता। यह देखिए आपका राग, इसमें कुछ मिलता ही नहीं है तो उन्होंने उसे खूँटी पर टाँग दिया और थोड़े दिन में झटका लगा तो वह टूट गया। मुझे थोड़ा-बहुत शौक भी था तो मैं फिर आगरा से बाजा खरीद लाई और दो महीने में सीख लिया। अभी वही चल रहा है। तो गुरुजी उसको बराबर कहते थे कि "मेरे पैरों में घुँघुरू बँधा दो कि फिर मेरी चाल देख लो"।
चाल देख लो अर्थात हमें भगवान की वह शक्ति मिल जाए और हम उस शक्ति को पा करके उसके तरीके का नाच नाच सकें। मैंने कहा कि यह खेल तो संघर्ष का है आप क्या कह रहे हैं, ये मत कहो। उन्होंने कहा कि होगा, संघर्ष का होगा चाहे जिसका होगा, पर मुझे तो उदाहरण बड़ा अच्छा लगता है, इसलिए मैं कहता हूँ। बेटा, जीवन जीना है तो एक खिलाड़ी के तरीके से जिओ।
खिलाड़ी के तरीके से जिएँ
जिस तरीके से खिलाड़ी स्टेज पर आते हैं तो मुखौटे लगाकर आते हैं, कोई राम बनकर आता है, कोई कृष्ण बनकर आता है, कोई क्या बनकर आता है तो क्या वस्तुतः वह कृष्ण है या राम है। न वो राम है, न वो कृष्ण है, वह एक मुखौटा है। आप अपने जीवन को ही खिलाड़ी के तरीके से मान लीजिए तो आपका सन्तोषमय जीवन कटता हुआ चला जाएगा।
दीन-दुःखियों की सेवा के लिए फिर आपके अन्दर एक पीड़ा पैदा होगी और उस पीड़ा को लेकर के जब आप जाएँगे तो रामकृष्ण परमहंस के तरीके से सर्वत्र आपको भगवान दिखाई पड़ेगा। रामकृष्ण परमहंस से एक पादरी ने पूछा और यह कहा कि हमने सुना है कि आप कालीमय हैं। क्या भगवान को आप दिखा सकते हैं? उन्होंने कहा कि भगवान इन चर्मचक्षुओं से नहीं देखा जा सकता है, लेकिन एक रूप में भगवान को हम देख सकते हैं। वह कौन-सा स्वरूप है?
उन्होंने कहा कि कुटिया में आ जाना आपको दिखा दिया जाएगा और उनको एक कोढ़ी की सेवा करते हुए दिखा दिया, जिस तरीके से माँ अपने बच्चे की सेवा करती है, उस तरीके से परमहंस ने सेवा की। पादरी ने देखा कि यह तो बिलकुल माँ कालीमय ही हैं और वह चरणों में गिर पड़ा।
रामकृष्ण परमहंस का उदाहरण
इस तरीके से एक और उदाहरण है कि उन्होंने विवेकानन्द से यह कहा कि विवेकानन्द एक कटोरे में शहद रखा हो और तुम मक्खी हो तो तू यह बता कि शहद को अन्दर से पिएगा कि पास से ही पिएगा। उन्होंने कहा कि देखिए गुरुदेव! मैं यदि मक्खी बना तो दूर से ही शहद चाट लूँगा, मैं कटोरे में जाने वाला नहीं हूँ। उन्होंने कहा कि तो तू डर गया, तू मृत्यु से डर गया और तू उस शहद में सम्पूर्ण नहाया नहीं; जबकि तुझे पूरे शहद में ही डुबकी लगानी चाहिए थी और पूरे शहद को ही तुझे चाटना चाहिए था, चाहे तेरे प्राण ही क्यों न चले जाते।
बेटे, यही बात आपके ऊपर भी लागू है कि आप आए हैं तो इस वातावरण में ऐसे घुल जाइए कि बस, तुम्हारे सामने दीन-दुनिया और कुछ रहे ही नहीं, न आपकी कोई मनोकामना रहे, न आपका कोई दुःख-कष्ट रहे। आप सही मानना कि आप जो दुःख-कष्ट लेकर के आए हैं, वे आपके कम होने वाले हैं।
कम होंगे ही, इसमें दो राय नहीं है, पर शर्त यही है कि आपकी मनोभूमि कैसी है। आपकी मनोभूमि इस लायक है कि आपने यहाँ जो भोजन किया है, वह आपने प्रसाद का रूप मानकर धारण किया है तो आपको बल मिलता हुआ चला जाएगा, आपकी बीमारी कम होती हुई चली जाएगी। देख लेना आपकी बीमारी कम होती हुई चली जाएगी; क्योंकि वह इस वातावरण में पकी है।
यह वातावरण बड़ी मुश्किल से गुरुजी ने अपनी तपस्या से, अपनी साधना से, अपनी आराधना से बनाया है। जहाँ अखण्ड दीपक है, उस अखण्ड दीपक के पास उन्होंने 24-24 लक्ष के 24 पुरश्चरण किए। आपको भी इसी तरीके से चलना है।
भगवान करे आपकी उपासना फलीभूत हो, पर फलीभूत तभी होगी, जब आप अपने अन्तःकरण को साफ-सुथरा बनाएँगे। इस हृदय-कमल को खिलने दीजिए, ताकि गायत्री माता आपके हृदय-कमल पर विराजमान होती हुई चली जाएँ। आपके हृदय में कूड़ा-कबाड़ा भरा हुआ है तो फिर बताइए किस तरीके से गायत्री माता आपके पास आएँगी, वे नहीं आएँगी।
वे बहुत होशियार हैं, दयालु भी हैं, करुणामय भी हैं, सब कुछ है, पर होशियार भी बहुत हैं। उनसे ज्यादा होशियार भी कोई नहीं है। वे गन्दे-गलीज पर नहीं बैठती हैं, चूहे पर नहीं बैठेंगी, कबूतर पर नहीं बैठेंगी, वे हंस पर बैठेंगी, जो विवेकशील होता है। नीर और क्षीर का जिसको विवेक होता है, ज्ञान होता है, उदार होता है, उसके ऊपर आकर के गायत्री माता बैठती हैं।
आप हंस बनने की कोशिश करना, आप कौआ बनने की कोशिश मत करना। आप हंस बनिए, ताकि आपके कन्धे पर आकर के गायत्री माता बैठें, जिसके लिए आप आए हैं और नौ दिवसीय सत्र करने के लिए आए हैं तो आपको उसमें सफलता मिले। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करती हूँ।
आज की बात समाप्त